Friday, 16 October 2020

Indian Freedom Fighter Privacy Policy


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Sunday, 11 October 2020

आचार्य नरेंद्र देव


 

आचार्य नरेंद्र देव

जन्म: 31 अक्टूबर, 1889, सीतापुर, उत्तर प्रदेश

निधन: 19 फ़रवरी, 1956, मद्रास

कार्य: समाजवादी, विचारक, शिक्षाशास्त्री और देशभक्त

नरेन्द्र देव भारत के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी, साहित्यकार, समाजवादी, विचारक और शिक्षाशास्त्री थे। हिन्दी, संस्कृत, फ़ारसी, अंग्रेज़ी, पाली आदि भाषाओं के ज्ञाता नरेन्द्र देव स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान कई बार जेल भी गए। विलक्षण प्रतिभा और व्यक्तित्व के धनी आचार्य नरेन्द्रदेव उच्च कोटि के निष्ठावान अध्यापक और महान शिक्षाविद् थे। वाराणसी स्थित काशी विद्यापीठ में आचार्य बनने के बाद से ‘आचार्य’ की उपाधि उनके नाम का एक अभिन्न अंग बन गई। देश की आजादी का जुनून उन्हें स्वतंत्रता आन्दोलन में खींच लाया। वह भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस के सक्रीय सदस्य थे और सन 1916 से 1948 तक ‘ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी’ के सदस्य भी रहे।

प्रारंभिक जीवन

नरेन्द्र देव का जन्म 31 अक्टूबर, 1889 को उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले  में हुआ था। उनके बचपन का नाम अविनाशीलाल था। उनके पिता बलदेव प्रसाद अपने समय के जाने-माने वकील थे। बालक अविनाशी का बचपन मुख्यतः फैजाबाद नगर में बीता। बलदेव प्रसाद धार्मिक प्रवित्ति के इंसान थे और राजनीति में भी थोड़ी बहुत दिलचस्पी लेते थे जिसके कारण उनके घर पर इन क्षेत्रों के लोगों का आना-जाना लगा रहता था। इस तरह बालक नरेन्द्र देव को स्वामी रामतीर्थ, पंडित मदनमोहन मालवीय, पं॰ दीनदयालु शर्मा आदि के संपर्क में आने का मौका मिला। धीरे-धीरे उनके मन में भारतीय संस्कृति के प्रति अनुराग उपजा और फिर बड़ा होने पर देश की सामाजिक और राजनैतिक दशा ने राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया।

नरेन्द्र देव ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.ए. किया और फिर पुरातत्व के अध्ययन के लिए काशी के क्वींस कालेज चले गए। तत्पश्चात उन्होंने सन् 1913 में संस्कृत में एम.ए. पास किया। चूँकि पिताजी जाने-माने वकील थे इसलिए घरवाले उन्हें भी वकालत पढ़ाना चाहते थे पर नरेंद्रदेव को यह पेशा पसंद नहीं था लेकिन उन्हें लगा कि वकालत करते हुए राजनीति में भाग लेना आसान हो जायेगा इस दृष्टि से कानून पढ़ा।

राजनैतिक जीवन

नरेंद्रदेव जी के राजनैतिक विचार धीरे-धीरे गरम दल के लोगों से मेल खाने लगे। अपने उग्र विचारधारा के कारण इन्होने कांग्रेस के अधिवेशनों में गरम दल के होने के कारण जाना छोड़ दिया। सन् 1916 में जब कांग्रेस में दोनों दलों में मेल हुआ तब फिर कांग्रेंस में आ गए।

वकालत की पढ़ाई के बाद उन्होंने 1915-20 तक पाँच वर्ष फैजाबाद जिले में वकालत की। इसी दौरान अंग्रेजी सरकार के विरोध में असहयोग आंदोलन प्रारंभ हुआ जिसके बाद नरेंद्रदेव ने वकालत छोड़ दिया और काशी विद्यापीठ चले गए जहाँ जाकर उन्होंने अध्यापन कार्य प्रारंभ किया। यहाँ उन्होंने विद्यापीठ में डॉ भगवानदास की अध्यक्षता में कार्य शुरू किया। वर्ष 1926 में वो विद्यापीठ के कुलपति भी बन गए और यहीं पर ‘आचार्य’ का सम्बोधन भी इनके नाम के साथ जुड़ गया। काशी विद्यापीठ के अध्यापकों और विद्यार्थियों ने नरेन्द्र देव के नेतृत्व में स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

नरेन्द्र देव अपने विद्यार्थी जीवन से ही राजनीति में रूचि लेने लगे थे। सन 1916 से लेकर 1948 तक ‘ऑल इंड़िया कांग्रेस कमेटी’ के सदस्य भी रहे और जवाहरलाल नेहरू के साथ ‘कांग्रेस वर्किंग कमेटी’ के भी सक्रिय सदस्य रहे।

ख़राब स्वास्थ्य के बावजूद नरेन्द्र देव ने 1930 के नमक सत्याग्रह, 1932 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन तथा 1941 के व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन में भाग लिया और जेल की यातनाएँ भी सहीं। 1942 में ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन के दौरान जब 8 अगस्त को गांधी जी ने “करो या मरो” प्रस्ताव रखा, तब  बंबई में कांग्रेस कार्यसमिति के तमाम सदस्यों के साथ इन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया। तत्पश्चात नरेन्द्र देव 1942-45 तक जवाहरलाल नेहरू के साथ अहमदनगर के किले में बंद रहे। यहीं पर उनके ज्ञान से प्रभावित होकर पंडित नेहरू ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “डिस्कवरी ऑफ़ इंड़िया” की पांडुलिपि में उनसे संशोधन करवाया।

कांग्रेस को समाजवादी विचारों की ओर ले जाने के उद्देश्य से सन 1934 में जयप्रकाश नारायण,  राममनोहर लोहिया तथा अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर आचार्य नरेन्द्र देव ने ‘कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी’ की स्थापना की और 1934 में प्रथम अधिवेशन के अध्यक्ष भी रहे। जब कांग्रेस पार्टी ने यह निश्चय किया कि कांग्रेस के अंदर कोई अन्य दल नहीं रहेगा, तब उन्होंने अपने साथियों के कांग्रेस पार्टी छोड़ दी। भारत में समाजवादी आंदोलन में आचार्य नरेंद्रदेव का बहुत महत्वपूर्ण स्थान रहा है।

भाषा ज्ञान

राजनैतिक कार्यकर्ता और विचारक के साथ-साथ नरेन्द्र देव एक साहित्यकार और महान शिक्षाविद भी थे। उन्हें संस्कृत, हिन्दी के अलावा अंग्रेज़ी, उर्दू, फ़ारसी, पाली, बंगला, फ़्रेंच और प्राकृत भाषाओँ का बहुत अच्छा ज्ञान था। ‘काशी विद्यापीठ’ के बाद वो ‘लखनऊ विश्वविद्यालय’ और ‘काशी हिन्दू विश्वविद्यालय’ के भी कुलपति रहे और शिक्षा के क्षेत्र में अपना अमूल्य योगदान दिया।

रचनाएँ

एक बार आचार्य नरेंद्रदेव जी ने “मेरे संस्मरण” शीर्षक रेडियो वार्ता में कहा था: “मेरे जीवन में सदा दो प्रवृत्तियाँ रही हैं – एक पढ़ने-लिखने की और, दूसरी राजनीति की!

बौद्धदर्शन के अध्ययन में उनकी विशेष रुचि थी और जीवन पर्यान्त वो बौद्धदर्शन के अध्ययन में लीन  रहे। उन्होंने जीवन के अंतिम दिनों में “बौद्ध-धर्म-दर्शन” पूरा किया और “अभिधर्मकोश” भी प्रकाशित कराया। इसके साथ-साथ “अभिधम्मत्थसंहहो” का भी हिंदी अनुवाद भी किया। उन्होंने बौद्ध दर्शन के पारिभाषिक शब्दों के कोश का निर्माणकार्य भी प्रांरभ किया था पर उनके आकस्मिक निधन से यह कार्य पूरा न हो सका।

आचार्य नरेन्द्र देव की प्रकाशित रचनाओं में सबसे महत्वपूर्ण उनके भाषण रहे हैं।

उन्होंने “विद्यापीठ” त्रैमासिक पत्रिका, “समाज” त्रैमासिक, “जनवाणी” मासिक, “संघर्ष” और “समाज” आदि साप्ताहिक पत्रों का संपादन किया। इन पत्र-पत्रिकाओं में कई लेख और टिप्पणियाँ समय-समय पर प्रकाशित हुए जो: राष्ट्रीयता और समाजवाद, समाजवाद : लक्ष्य तथा साधन, सोशलिस्ट पार्टी और मार्क्सवाद, भारत के राष्ट्रीय आंदोलन का इतिहास, युद्ध और भारत, किसानों का सवाल आदि के रूप में संग्रहित हैं।

निधन

आचार्य नरेन्द्र देव जीवन भर दमे के मरीज रहे। अपने मित्र और उस समय मद्रास के राज्यपाल श्रीप्रकाश के निमंत्रण पर स्वास्थ्य लाभ के लिए वो चेन्नई गए थे जहाँ दमे के कारण 19 फ़रवरी, 1956 को एडोर में उनका निधन हो गया। मृत्यु के समय उनकी उम्र 67 साल थी।

टाइम लाइन (जीवन घटनाक्रम)

1889: नरेन्द्र देव का जन्म हुआ

1899: अपने पिता के साथ कांग्रेस के लखनऊ अधिवेसन में भाग लिया

1904: 15 साल की उम्र में विवाह

1911: स्नातक की शिक्षा पूर्ण हुई

1913: स्नातकोत्तर की शिक्षा पूर्ण हुई

1915: वकालत की पढाई पूरी की

1921: काशी विद्यापीठ में अध्यापन कार्य प्रारंभ किया

1926: काशी विद्यापीठ के आचार्य नियुक्त किये गए

1928: इंडिपेंडेंस ऑफ़ इंडिया लीग में शामिल हुए

1947-1951: लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति रहे

1951-1953: बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति रहे

1956: 67 साल की उम्र में निधन

मुहम्मद अली जीवनी

 


 

मुहम्मद अली जीवनी


मुहम्मद अली पूर्व अमेरिकी पेशेवर मुक्केबाज थे,जिन्हें खेल इतिहास में दुनिया का सबसे बड़ा हेवीवेट मुक्केबाज कहा जाता है। अली 3 बार हेवीवेट चैम्पियन रहे हैं। उन्हें बीबीसी से स्पोर्ट्स पर्सनैलिटी ऑफ द सेंचुरी तथा स्पोर्ट्स इलस्ट्रेटेड द्वारा स्पोर्ट्समैन ऑफ द सेंचुरी का सम्मान मिल चुका है। अखाड़े में अली अपने फुटवर्क और मुक्के के लिए जाने जाते थे। अली तीन बार लेनियल चैंपियनशिप जीतने वाले इकलौते विश्व हैवीवेट चैंपियन हैं इन्होंने ये ख़िताब 1964, 1974, और 1978 में खिताब जीता।


     
   25 फरवरी, 1964, और 19 सितम्बर, 1964 के बीच, अली ने हैवीवेट बॉक्सिंग चैंपियन के रूप में शासन किया। इन्हें "महानतम" उपनाम दिया गया। ये अनेक ऐतिहासिक बॉक्सिंग मैचों में शामिल रहे। इनमें से सबसे उल्लेखनीय "फाइट ऑफ़ द सेंचुरी (सदी की लड़ाई)", "सुपर फाइट 2 (सुपर लड़ाई द्वितीय)" और " थ्रिला इन मनीला (मनीला में रोमांच)" बनाम अपने प्रतिद्वंद्वी जो फ्रेज़ियर, " रंबल इन द जंगल" बनाम जॉर्ज फोरमैन आदि हैं। अली ने 1981 में मुक्केबाजी से संन्यास ले लिया.‍

आरंभिक जीवन :

        मुहम्मद अली का जन्म केतुंडी प्रान्त के लौइस्विले नामक स्थान पर 17 जनवरी 1942 में हुआ था | बचपन में उनका नाम मार्सीलस क्ले जूनियर था | मुक्केबाजी के इतिहास में महानतम मुक्केबाजो में Muhammad Ali  अली ने बचपन में ही अपनी निर्भीकता का परिचय देना शुरू कर दिया था | उनका लालन पालन देश के जिस दक्षिणी हिस्से में हुआ था वहा उन्हें अश्वेत होने के नाते नस्लीय भेदभाव का शिकार होना पड़ा था और उनके मन में मुक्केबाज बनने का संकल्प दृढ़ होता गया था |

        बारह साल की उम्र में मुहम्मद अली के साथ एक घटना घटी जिसकी वजह से उनका मुक्केबाज बनना निश्चित हो गया | उनकी साइकिल चोरी हो गयी और उन्होंने पुलिस अधिकारी जो मार्टिन को बताया कि वो वो छोर को घूंसा मारना चाहते है | मार्टिन ने उनसे कहा “किसी को लड़ने से पहले तुम्हे अच्छी तरह लड़ना सीखना होगा ” | पुलिस अधिकारी होने के साथ साथ मार्टिन स्थानीय जिम में लडको को मुक्केबाजी का प्रशिक्ष्ण देते थे , जहा अली भी मुक्केबाजी सीखने लगे. अली निजी जिन्दगी में आध्यात्मिक शान्ति की तलाश कर रहे थे | 1964 में उन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया और अपना नाम मुहम्मद अली रख लिया |


करियर :

        1954 में Muhammad Ali ने अपनी पहली लड़ाई लड़ी और उसमे जीत हासिल की। 1956 में उन्होंने light heavyweight division में Golden Gloves tournament में जीत  हासिल की। 1959 में उन्होंने  light-heavyweight division में National Golden Gloves Tournament of Champions और  Amateur Athletic Union’s national title में जीत हासिल की।

        1960 में उन्होंने ओलिंपिक खेलों में light-heavyweight division का स्वर्ण पदक जीता। 1971 में लड़ी गई fight of the century, Ali और Joe Frazier के बीच 8 मार्च, 1971 को हुई ये लड़ाई 15 round तक गई और कड़े संघर्ष के बाद Joe Frazier को इसमें विजेता घोषित किया गया और इस हार के साथ Muhammad Ali ने अपने boxing Career में पहली बार हार का सामना किया।

        कम IQ  के चलते अली को आर्मी से दो बार reject किया गया। हालाँकि बाद में आर्मी ने अली को fit घोषित कर दिया और उन्हें सेना में शामिल करने के लिए ड्राफ्ट तैयार किया लेकिन अब अली ने सेना में जाने से मना  कर दिया। उसी समय अमेरिका ने वियतनाम से युद्ध घोषित कर दिया और सेना ने अली को युद्ध में शामिल होने को कहा।

        अली ने यह कहकर मना कर दिया कि मेरी वियतनाम के लोगों से कोई लड़ाई नहीं है और ना ही किसी वियतनामी ने मेरे खिलाफ ख़राब शब्दों का इस्तमाल किया है। अली को सेना का ड्राफ्ट नहीं मानने के कारण 5 साल की सजा सुनाई गई और उन पर 10 हज़ार डॉलर का जुर्माना लगाया गया। बाद  में अपील करने पर supreme court ने इस सजा को गलत बताया, जिससे अली को 10 दिन ही जेल में रहना पड़ा।

        8 मार्च 1971 में न्यूयोर्क के एक रिंग में एक तरफ लगातार 26 मैच जीतने वाला जोसेफ विलियम फ्रेज़र था, वहीं दूसरी ओर दुनियाँ का सबसे अच्छा बॉक्सर और लगातार 31 मैच जीतने वाला मुहम्मद अली थे। मुक़ाबला स्टार्ट हुआ। उस समय लोगों के दिलों और जवां पर दो ही नाम थे, फ्रेज़र और अली। सबक़ों यकीन था, अली फ्रेज़र को हरा देगा। मैच पहला राउंड…. 14 वीं राउंड तक ठीक था, पर 15 वीं राउंड में फ्रेज़र ने दुनियाँ को चौकाते हुए हेवीवेट चैम्पियन को मात दे दिया। इस तरह 10 सालों तक अजेय रहे अली को पहली मात मिली।


रोम ओलंपिक :

        1960 में अली अमेरिका की बॉक्सिंग कोटे से रॉम ओलिम्पिक के लिए क्वालिफाई कर गए। जहां उन्होंने अपनी बॉक्सिंग की अलग ही रणनीति पेश की, जिसे देख दुनियाँ भोचक्की ही रह गई। अली ने अपनी तेज स्पीड और फेंसी कदमों से लगातार तीन बाउट्स जीतकर पोलेंड के बॉक्सर जिगनी पिटकोव्स्की को फ़ाइनल में हराकर गोल्ड मेडल पर अपनी मुहर लगाई। अब अली अमेरिका के हीरो बन चुके थे और उन्होंने प्रोफेसनल बॉक्सिंग जाने का निर्णय लिया।

        पर इसी समय उनके शहर लुईसविले के रेस्त्रा में उन पर किसी ने नस्ल भेदी टिप्पणी कर दिया, जिसके कारण वे गुस्से में आकर अपना गोल्ड मेडल ओहियो नदी में फेंक दिया। पर स्वभाव के जिद्दी अली ने प्रोफेशनल बॉक्सिंग का निर्णय नहीं बदला। और उन्होंने 1963 में अपने पहले ही प्रोफेशनल मुक़ाबले में ब्रिटिश हेवी वेट चैंपियन हेनरी कूपर को धूल चटाकर दुनियाँ को अपना दम दिखाया। 1964 में वे सोनी लिसन को हराकर पहली बार दुनियाँ का हेवी वेट चैंपियन बने। लोग उन्हें उनके जीत के लिए “The Greatest” कहते थे।



विचार :

• दोस्ती कुछ ऐसा नहीं है जो आप स्कूल में सीखते है। लेकिन यदि आपने दोस्ती का मतलब नहीं सीखा तो दरअसल आपने कुछ नहीं सीखा।
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दोस्ती कुछ ऐसा नहीं है जो आप स्कूल में सीखते है। लेकिन यदि आपने दोस्ती का मतलब नहीं सीखा तो दरअसल आपने कुछ नहीं सीखा।
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मुझे पता है मैं कहाँ जा रहा हूँ और मुझे सच पता है, और मुझे वो नहीं होना है जो तुम चाहते हो। मैं वो होने के लिए स्वतंत्र हूँ जो मैं चाहता हूँ।
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मैं सबसे महान हूँ, मैंने ये तब कहा जब मुझे पता भी नहीं था कि मैं हूँ।
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एक महान चैंपियन बन्ने के लिए आपको इस बात में यकीन करना होगा कि आप सर्वश्रेस्ठ हैं . अगर नहीं हैं तो होने का दिखावा करिये कि आप हैं .
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अपने सपनो को सच करने का सबसे अच्छा तरीका है जाग जाओ .
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बुद्धिमत्ता ये जानना है कि कब आप बुद्धिमान नहीं हो सकते .
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बिना डर के हम बहादुर नहीं हो सकते .
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इतिहास में सच्चे महान लोग कभी अपने लिए महान नहीं होना चाहते थे . वो बस इतना चाहते थे कि दूसरों का भला करें और ईश्वर के करीब हो जाएं .
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अब मैं स्वर्ण पदक जीत चुका था . लेकिन इसका कोई मतलब नहीं था क्योंकि मेरी त्वचा का रंग सही नहीं था .
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चैंपियंस जिम में नहीं बनाये जाते . चैंपियंस किसी ऐसी चीज से बनाये जाते हैं जो उनके भीतर कहीं होती है – एक इच्छा , एक सपना , एक विज़न . उनके पास कौशल और इच्छाशक्ति होनी चाहिए . लेकिन इच्छाशक्ति कौशल से ताकतवर होनी चाहिए .
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आप पहाड़ पर चढाई से नहीं थकते; जबकि जूते में पड़ा एक कंकड़ आपको थका देगा.
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आपको धरती पर रहने के किराये का चुकारा, दूसरों की सेवा के रूप में करना चाहिये.
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आप दिनों को मत गिनों, ऐसा कुछ करों लोग आपके दिनों को याद करें.
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जो आदमी 50 की उम्र में दुनिया को वैसे ही देखता है जैसे 20 की उम्र में देखता था तो उसने जिन्दगी 30 वर्ष बर्बाद ही किये.
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असंभव एक बड़ा शब्द मात्र है जो छोटे लोगों की देन है जो इस संसार में जिन्दगी को आराम से जीना चाहते है जबकि उनके पास दुनिया बदने की क्षमता है. असंभव शब्द तथ्यहीन है. यह एक राय मात्र है. असंभव कोई घोषित तथ्य नहीं है. यह हिम्मत का काम है. असंभव एक क्षमता का माप है. असंभव अस्थायी है. असंभव कुछ भी नहीं है.
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जीवन एक जुआ है. आपको चोट लग सकती है, बल्कि लोग हवाई जहाज दुर्घटना में मर भी जाते है, कार एक्सीडेंट में हाथ-पैर गवां देते हैं; लोग हर रोज मरते हैं. ऐसा ही फाइटर्स के साथ होता है, कुछ मर जाते हैं, कुछ के चोट लगती है, कुछ चल जाते है. मगर आप स्वयं यह मानकर कि ऐसा ही हमारे साथ होगा, मैदान मत छोड़ो.
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यह मात्र कार्य ही है. घास को उगना है, व पक्षियों को उड़ना है, हवा को घूल उड़ानी है. मुझे लोगों को बॉक्सिंग में हराना है.
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जिस व्यक्ति के पास कल्पना शक्ति नहीं है, उसके पास उड़ान के लिये पंख नहीं होते.
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जब आपको अच्छा जवाब नहीं सूझे तो खामोशी ही श्रेष्ठ है.


मृत्यु :

        1984 से ये पार्किंसन रोग से पीड़ित थे। इससे पहले पेशाब की नली में संक्रमण की शिकायत की वजह से दिसंबर 2014 में भी ये अस्पताल में भर्ती हुए थे. 2 जून 2016 को इन्हें साँस की समस्या के कारण अस्पताल में भर्ती करवाया गया था। हालाँकि इनकी स्थिति को अच्छा बताया गया, पर इनकी हालात ख़राब होती चली गयी। इनकी मौत का कारण सेप्टिक शॉक को बताया गया। 3 जून 2016 को इन्हें मृत घोषित कर दिया गया।

भूलाभाई देसाई की जीवनी


 

भूलाभाई देसाई की जीवनी

परिचय

भूलाभाई  देसाई भारत के एक जाने-माने स्वाधीनता कर्मी, अपने समय के जाने-माने अधिवक्ता और गाँधी जी के महत्वपूर्ण सहयोगी थे। वे पूरे देश में मशहूर तब हुए, जब उन्होंने आजाद हिंद फौज के सैनिकों गुरबक्श सिंह ढिल्लन, शहनवाज खान, और प्रेम कुमार सहगल पर लगे राजद्रोह के मुकदमें में उनका साथ दिया।

भूलाभाई देसाई को लोग ‘देसाई लियाकत’ समझौते के लिए भी जानते हैं, जो मुस्लिम लीग के नेता लियाकत अली खान और भूलाभाई देसाई के बीच गुप्त रूप से हुआ था। ऐसा कहा जाता है कि आधिकारिक रूप से न कांग्रेस और न ही मुस्लिम लीग ने लियाकत अली खान और भूलाभाई देसाई के बीच हुई इस गुप्त संधि को स्वीकार किया और जब इस संधि की बात बाहर आई तो सभी ने उनकी आलोचना की।

शुरूआती जीवन

भूलाभाई देसाई का जन्म 13 अक्टूबर 1877 को गुजरात के वलसाड़ शहर में हुआ था। शुरुआत में उनके मामा ने ही उन्हें शिक्षा प्रदान की। उसके बाद आगे की शिक्षा उन्होंने वलसाड़ के ‘अवाबाई स्कूल’ और फिर बॉम्बे के ‘भरदा हाई स्कूल’ से प्राप्त की। सन् 1895 में उन्होंने मैट्रिकुलेशन की परीक्षा भरदा हाई स्कूल से पास की। इस परीक्षा में भूलाभाई ने अपने पूरे स्कूल में टॉप किया। जब भूलाभाई देसाई स्कूल में थे, तब उनकी शादी ‘इच्छाबेन’ से हो गई। उन दोनों का एक बच्चा हुआ, जिसका नाम ‘धीरुभाई’ रखा गया।

सन् 1923 में कैंसर से इच्छाबेन की मृत्यु हो गई। इसके बाद भूलाभाई देसाई ने बॉम्बे के ‘एल्फिन्सटन कॉलेज’ में दाखिला लिया और अंग्रेजी साहित्य और इतिहास में अच्छे अंको से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। भूलाभाई देसाई इतिहास और राजनीतिक अर्थव्यवस्था के विषयों में प्रथम स्थान पर आये और  इस वजह से उन्हें ‘वर्ड्सवर्थ पुरस्कार’ और एक छात्रवृत्ति प्राप्त हुई। इसके बाद भूलाभाई देसाई ने अंग्रेजी साहित्य के विषय में स्नातकोत्तर भी किया।

स्नातकोत्तर के बाद भूलाभाई देसाई गुजरात कॉलेज में अंग्रेजी और इतिहास के प्रोफेसर के रूप में काम करने लगे। लोगों को पढ़ाने के दौरान भूलाभाई देसाई ने कानून की पढ़ाई की और बॉम्बे उच्च न्यायालय में वकालत करने की इच्छा से पंजीकरण कराया और धीरे-धीरे उनकी गिनती पहले बॉम्बे और फिर पूरे देश के अग्रणी विधिवेत्ताओं में होने लगी।

राजनीतिक जीवन

भूलाभाई देसाई ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत ‘एनी बेसेंट’ के ‘आल इंडिया होम रूल लीग’ के साथ जुड़कर की। भूलाभाई देसाई ब्रिटिश प्रभाव वाली ‘इंडियन लिबरल पार्टी’ से भी सम्बन्ध रखते थे पर ‘साइमन कमीशन’ के मुद्दे के दौरान सन् 1928 में उन्होंने ‘इंडियन लिबरल पार्टी’ को छोड़ दिया। साइमन कमीशन को भारत में संवैधानिक सुधार के सुझाव देने के लिए बनाया गया था। साइमन कमीशन के सारे सदस्यों के यूरोपीय होने की वजह से पूरे भारत ने इसका विरोध किया।

सन् 1928 के ‘बारडोली सत्याग्रह’ के बाद ब्रिटिश सरकार के जांच दल के सामने किसानों का पक्ष रखने के दौरान वे कांग्रेस पार्टी के संपर्क में आये। भूलाभाई देसाई ने किसानों का पक्ष बहुत कुशलता से रखा और आन्दोलन को सफल करने में बहुत जरुरी भूमिका निभाई। भूलाभाई देसाई औपचारिक तरीके से कांग्रेस पार्टी में सन् 1930 में शामिल हुए थे।

भूलाभाई देसाई के अनुसार विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार एक असरदार तरीका था। इस वजह से उन्होंने एक सभा का गठन किया, जिसका नाम ‘स्वदेशी सभा’ रखा और साथ ही उन्होंने 80 मिल मालिकों को विदेशी माल न खरीदने के लिए मना लिया। सरकार ने इस संगठन को अवैध करार कर दिया और सन् 1932 में भूलाभाई देसाई को गिरफ्तार कर लिया गया। भूलाभाई देसाई की बिगडती तबियत के चलते उन्हें जेल से बाहर कर दिया गया और वे इलाज के लिए यूरोप चले गये।

जब कांग्रेस कार्य समिति का फिर से गठन हुआ, तब सरदार पटेल ने भूलाभाई देसाई को भी समिति में शामिल करने को कहा। नवम्बर 1934 को भूलाभाई देसाई को गुजरात से केन्द्रीय विधान सभा के लिए चुना गया। विधान सभा में भूलाभाई देसाई ने कांग्रेस सदस्यों का नेतृत्व किया। पूरे देश में, दूसरे विश्व युद्ध में भारत को शामिल किए जाने के मुद्दे का विरोध किया जा रहा था और भूलाभाई देसाई ने भी विधान सभा में इसका विरोध किया।

गाँधी जी द्वारा शुरू किए गये ‘सत्याग्रह आन्दोलन’ में हिस्सा लेने की वजह से भूलाभाई देसाई को ब्रिटिश सरकार द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया था। गिरफ्तार करने के बाद भूलाभाई देसाई को पुणे के येरवदा जेल में डाल दिया गया था। जेल में उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा, जिसकी वजह से उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया। खराब स्वास्थ्य की ही वजह से वे ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ में भाग नहीं ले सके।

देसाई-लियाकत समझौता

भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस कार्य समिति के सभी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया था। सन् 1942 और 1945 के मध्य में भूलाभाई देसाई का नाम उन कुछ कांग्रेस नेताओं की सूची में था, जिन्हें जेल में नहीं डाला गया था। भूलाभाई देसाई ने ब्रिटिश सरकार पर राजनीतिक बंदियों को आजाद करने के लिए दबाव बनाने के साथ-साथ मुस्लिम लीग के दूसरे सबसे बड़े नेता ‘लियाकत अली खान’ के साथ गुप्त तरीके से समझौता भी किया। ऐसा कहा जाता है के इन दोनों ने यह समझौते की बात किसी को भी नहीं बताई।

जब इस समझोते से जुडी हुई खबरे प्रेस में छपी, तब दोनों पार्टियों की तरफ से प्रतिक्रियाएं आयीं और मुस्लिम लीग ने इस बात को ख़ारिज कर दिया और कांग्रेस के अन्दर भूलाभाई देसाई का मान कम हो गया।

मृत्यु

भूलाभाई देसाई 1930 और 1940 के दशकों में कई बार बीमार पड़े। 6 मई 1946 को सेहत ख़राब होने की वजह से उनका देहांत हो गया।

मौलाना हसरत मोहानी

मौलाना हसरत मोहानी


मूल नाम :सय्यद फ़ज़लुल हसन

जन्म :14 Oct 1878 | उन्नाव, उत्तर प्रदेश

निधन :13 May 1951 | लखनऊ, उत्तर प्रदेश

 मौलाना हसरत मोहानी का जन्म 1 जनवरी 1875 को उन्नाव में हुआ था। मौलाना हसरत मोहानी भारत की आज़ादी की लड़ाई के सच्चे सिपाही होने के साथ-साथ शायर, पत्रकार, राजनीतिज्ञ और ब्रिटिश भारत के सांसद थे। 13 मई 1951को कानपुर, उत्तर प्रदेश में इनका निधन हुआ था।

मौलाना हसरत मोहानी 'इन्कलाब ज़िन्दाबाद' का नारा देने वाले आज़ादी के सच्चे सिपाही थे, उनका वास्तविक नाम 'सैयद फ़ज़्लुल्हसन' और उपनाम 'हसरत' था। वे उत्तर प्रदेश के ज़िला उन्नाव के मोहान गांव में पैदा हुये थे इसलिये 'मौलाना हसरत मोहानी' के नाम से मशहूर हुए। इनका उपनाम इतना प्रसिद्ध हुआ कि लोग इनका वास्तविक नाम भूल गए।

इनकी आरंभिक शिक्षा घर पर ही हुई थी। ये बहुत ही होशियार और मेहनती विद्यार्थी थे और उन्होंने राज्य स्तरीय परीक्षा में टॉप किया था। बाद में उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी में पढ़ाई की जहाँ उनके कालेज के साथी मौलाना मोहम्मद अली जौहर और मौलाना शौक़त अली आदि थे। अलीगढ़ के छात्र दो दलों में बँटे हुए थे। एक दल देशभक्त था और दूसरा दल स्वार्थभक्त था। ये प्रथम दल में सम्मिलित होकर उसकी प्रथम पंक्ति में आ गए।

यह तीन बार कॉलेज से निर्वासित हुए। उन्होंने सन 1903 ई. में बी. ए. परीक्षा उत्तीर्ण की थी। इसके अंर्तगत इन्होंने एक पत्रिका 'उर्दुएमुअल्ला' भी निकाली और नियमित रूप से स्वतंत्रता के आंदोलन में भाग लेने लगे। यह कई बार जेल गए तथा देश के लिए बहुत कुछ बलिदान किया। उन्होंने एक खद्दर भण्डार भी खोला, जो खूब चला।

हसरत मोहानी ने लखनऊ के प्रसिद्ध शायर और अपने उस्ताद तसलीम लखनवी और नसीम देहलवी से शायरी की शिक्षा हासिल की। हसरत ने उर्दू ग़ज़ल को एक नितांत नए तथा उन्नतिशील मार्ग पर मोड़ दिया है। उर्दू कविता में स्त्रियों के प्रति जो शुद्ध और लाभप्रद दृष्टिकोण दिखलाई देता है, प्रेयसी जो सहयात्री तथा मित्र रूप में दिखाई पड़ती है तथा समय से टक्कर लेती हुई अपने प्रेमी के साथ सहदेवता तथा मित्रता दिखलाती ज्ञात होती है, वह बहुत कुछ हसरत ही की देन है। उनकी कुछ खास किताबें 'कुलियात-ए-हसरत', 'शरहे कलामे ग़ालिब', 'नुकाते-ए-सुखन, 'मसुशाहदाते ज़िन्दां' आदि बहुत मशहूर हुयीं।

उस्ताद ग़ुलाम अली द्वारा गाई गई उनकी ग़ज़ल 'चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है' भी बहुत मशहूर हुई जिसे बाद में फिल्म निकाह में फिल्माया गया। उन्होंने ग़ज़लों में ही शासन, समाज तथा इतिहास की बातों का ऐसे सुंदर ढंग से उपयोग किया है कि उसका प्राचीन रंग अपने स्थान पर पूरी तरह बना हुआ है। उनकी ग़ज़लें अपनी पूरी सजावट तथा सौंदर्य को बनाए रखते हुए भी ऐसा माध्यम बन गई हैं कि जीवन की सभी बातें उनमें बड़ी सुंदरता से व्यक्त की जा सकती है।

उन्हें सहज में 'उन्नतशील ग़ज़लों का प्रवर्तक कहा जा सकता है। हसरत ने अपना सारा जीवन कविता करने तथा स्वतंत्रता के संघर्ष में प्रयत्न एवं कष्ट उठाने में व्यतीत किया। साहित्य तथा राजनीति का सुंदर सम्मिलित कराना कितना कठिन है, ऐसा जब विचार उठता है, तब स्वत: हसरत की कविता पर दृष्टि जाती है। इनकी कविता का संग्रह 'कुलियात-ए-हसरत' के नाम से प्रकाशित है।

हमारे देश की आज़ादी की लड़ाई में इस देश में रहने वाली हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख आदि सभी क़ौमों के लोगों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था और न सिर्फ हिस्सा लिया बल्कि कुरबानियँ भी दीं। इन आज़ादी के सिपाहियों ने जंग में ख़ास भूमिका ही अदा नहीं की बल्कि बहुत भारी क़ीमत अदा की। हालांकि इस जंग ने हिन्दुस्तानी आवाम को नीचे से ऊपर तक, आम आदमी से लेकर असरदार तबकों तक को एक प्लेटफार्म पर इकट्ठा कर जोड़ने का काम किया और इस एकता ने भारत की ब्रिटिश सरकार के सामने बहुत बड़ी चुनौती खड़ी कर दी थी, लेकिन हमारे देश के उस समय के बादशाहों और राजाओं, आम किसान और मजदूरों, धर्मगुरुओं, साधु सन्तों, धार्मिक विद्वानों और मौलानाओं को, जंगे आज़ादी में हिस्सा लेने की वजह से, सख्त सजाएं भुगतनी पड़ी।

सैंकड़ों ज़ागीरदारों की जागीरें छीन ली गई और उलेमाओं यानि इस्लामी धर्म गुरुओं को माल्टा के ठन्डे इलाक़ों की जेलों में और अंडमान निकोबार द्वीप समूह के निर्जन स्थानों में सजा भुगतने के लिये मजबूर होना पड़ा। मौलाना हसरत मोहानी ने भी अंग्रेजों से कभी समझौता नहीं किया और इन आज़ादी के सिपाहियों की तरह खुशी-खुशी तकलीफें और सजाएं भुगतीं।

हसरत मोहानी आज़ादी के बहुत बड़े दीवाने थे और ख़ासकर भारत की आज़ादी से उन्हें बहुत प्यार था। वे बालगंगाधर राव को बड़े सम्मान से तिलक महाराज कहते थे और उनके बहुत बड़े प्रशंसक थे क्योंकि उन्होंने कहा था कि आज़ादी मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। उनकी पत्नी निशातुन्निसा बेगम, जो हमेशा परदे में रहती थीं, ने भी अपने पति के साथ आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लिया था। मौलाना हसरत मोहानी आज़ादी की लड़ाई में इस तरह घुलमिल गये थे कि उनके लिये कि इस राह में मिलने वाले दुख-दर्द, राहत-खुशी एक जैसे थे।

वे हर तरह के हालात में अपने आप को खुश रखना जानते थे। उन्होंने बहुत थोड़ी सी आमदनी से, कभी कभी बिना आमदनी के, गुज़ारा किया। वे अंग्रेजों द्वारा कई बार जेल में डाले गये लेकिन उफ़ तक न की और अपना रास्ता नहीं बदला। उनकी सबसे बड़ी ख़ासियत यह थी कि वे अंजाम की फ़िक्र किये बिना, जो सच समझते थे कह देते थे। सच की क़ीमत पर वह कोई समझौता नहीं करते थे।

मौलाना हसरत मोहानी कालेज के ज़माने में ही आज़ादी की लड़ाई में शामिल हो गये थे। किसी तरह का समझौता न करने की आदत और नजरिये की वजह से उन्हें कालेज के दिनों में काफ़ी परेशानियों का सामना करना पड़ा। कालेज से निकलने के बाद उन्होंने एक उर्दू मैगजीन 'उर्दू ए मोअल्ला' निकालना शुरू की जिसमें वे जंगे आज़ादी की हिमायत में सियासी लेख लिखा करते थे। सन 1904 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गये और सूरत सत्र 1907 में प्रतिनिधि के रूप में उपस्थित रहे।

वे कांग्रेस के अधिवेषणों और सत्रों की रिपोर्ट और समाचार अपनी मैगजीन उर्दू ए मुअल्ला में प्रकाशित करते रहते थे उन्होंने कलकत्ता, बनारस, मुम्बई आदि में आयोजित होने वाले कई कांग्रेसी सत्रों की रिपोर्ट अपनी मैगजीन उर्दू ए मुअल्ला में प्रकाशित की थीं। सूरत के कांग्रेस सेशन 1907 में जब शान्तिपसन्द लोगों के नरम दल और भारत की पूरी आज़ादी की हिमायत करने वाले गरम दल का विवाद उठ खड़ा हुआ तो उन्होंने तिलक के साथ कांग्रेस छोड़ दी और वे मुस्लिम लीग की तरह कांग्रेस से भी नफरत करने लगे।

एक दिलचस्प बात यह है कि मौलाना हसरत मोहानी ने अहमदाबाद में 1921 के सत्र में भारत के पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव रखा जबकि महात्मा गाँधी उस वक्त इसके लिये तैयार नहीं थे और अंग्रेजों के अधीन होम रूल[6] के समर्थक थे। इस वजह से मौलाना अपना प्रस्ताव पास कराने में कामयाब नहीं हुये। इसी प्रकार मुस्लिम लीग के अहमदाबाद सेशन में उन्होंने अपने भाषण के दौरान पूर्ण स्वराज का का प्रस्ताव पेश किया था हालांकि इसे मंजूर कराने में वे कामयाब नहीं हुये। बीसवीं सदी के शुरू में हसरत मोहानी ने अलीगढ़ में सविनय अवज्ञा आन्दोलन की हिमायत में स्वदेशी स्टोर शुरू किया।

उन्होंने यह स्टोर उस वक्त शुरू किया जब ब्रिटिश सरकार ने उनकी मैगजीन पर पाबन्दी लगा दी। मौलाना स्वदेशी आन्दोलन के इतने बड़े हिमायती थे कि उन्होंने दिसम्बर की ठन्डी रात में भी, अपने साथी मौलाना सुलेमान नदवी के ऑफिस में निवास के दौरान, विदेशी कम्बल इस्तेमाल करने से मना कर दिया। मौलाना सुलेमान नदवी ने खुद इस घटना का वर्णन किया।

आज भी हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में अगर कोई आन्दोलन या मूवमेंट चलता है तो 'इंक़लाब ज़िन्दाबाद' का नारा उसका खास हिस्सा होता है। हमारे देश की कोई भी सियासी पार्टी या कोई संगठन अपनी मांगों के लिये मुजाहरे और प्रदर्शन करता हैं तो इस नारे का इस्तेमाल आन्दोलन में जान फूंक देता है। भारत की आज़ादी की लड़ाई में तो यह नारा उस लड़ाई की जान हुआ करता था और जब भी, जहाँ भी यह नारा बुलन्द होता था आज़ादी के दीवानों में जोश का तू़फ़ान भर देता था।

इन्कलाब जिन्दाबाद का यह नारा आज़ादी के अज़ीमुश्शान सिपाही मौलाना हसरत मोहानी का दिया हुआ है। भारत की आज़ादी में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने वाले हिन्दुस्तानी रहनुमाओं और मुजाहिदों की फेहरिस्त में मौलाना हसरत मोहानी का नाम सरे फेहरिस्त शामिल है। उन्होंने इंक़लाब ज़िन्दाबाद का नारा देने के अलावा टोटल फ्रीडम यानि पूर्ण स्वराज्य यानि भारत के लिये पूरी तरह से आज़ादी की मांग की हिमायत की थी।

हकीकत में, देशभक्त होने के साथ-साथ, मौलाना हसरत मौलाना बहुत सारी खूबियों के मालिक थे। वे साहित्यकार, शायर, पत्रकार, इस्लामी विद्वान, समाजसेवक और उसूलपरस्त राजनीतिज्ञ थे। वे बहुत काबिल, ईमानदार और सच्चे मुसलमान थे लेकिन उन्होंने कम्युनिस्ट विचारधारा को भी आगे बढ़ाया। वे भारत में कम्युनिस्ट पार्टी के फाउन्डर मेम्बरों में से एक थे। वे भगवान श्रीकृष्ण के भी प्रशंसक थे। हिन्दुस्तान पाकिस्तान के बंटवारे के बाद उन्होंने पाकिस्तान के बजाय हिन्दुस्तान में रहना पसन्द किया, किन्तु पाकिस्तान में भी लोग उन्हें उसी सम्मान से देखते हैं जिस तरह हिन्दुस्तान में उन्हें सम्मान दिया जाता है।

हसरत मोहानी की मृत्यु 13 मई, सन 1951 ई. को कानपुर में हुई थी।

भीखाजी कामा


 

भीखाजी कामा

जन्म: 24 सितम्बर 1861

मृत्यु: 13 अगस्त, 1936

कार्य: स्वतंत्रता सेनानी, पहली भारतीय क्रांतिकारी जिन्होनें विदेश में सवर्प्रथम राष्टीय झंडा फ़हराया था

भीखाजी जी रूस्तम कामा अथवा मैडम कामा भारतीय मूल की फ्रांसीसी नागरिक थीं जिन्होंने दुनिया के विभिन्न देशों में जाकर भारत के स्वतंत्रता के पक्ष में माहौल बनाने का कार्य किया। मैडम कामा ने जर्मनी के स्टटगार्ट शहर में 22 अगस्त 1907 में सातवीं अंतर्राष्ट्रीय कांग्रेस के दौरान भारतीय तिरंगा फ़हराया। उन्होंने इस तिरंगे में भारत के विभिन्न समुदायों इत्यादी को दर्शाया था। उनका तिरंगा आज के तिरंगे जैसा नहीं था।

प्रारंभिक जीवन

भीकाजी कामा का जन्म 24 सितम्बर 1861 को बम्बई में एक पारसी परिवार में हुआ था। मैडम कामा के पिता प्रसिद्ध व्यापारी थे। इनके पिता का नाम सोराबजी पटेल था। भीखाजी के नौ भाई-बहन थे। उनका विवाह 1885 में एक पारसी समाज सुधारक रुस्तम जी कामा से हुआ था।

देश की आजादी के लिए कार्य

भीकाजी ने लन्दन, जर्मनी तथा अमेरिका का भ्रमण कर भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में माहौल बनाया था। वे जर्मनी के स्टटगार्ट नगर में 22 अगस्त 1907 में हुई सातवीं अंतर्राष्ट्रीय कांग्रेस में तिरंगा फहराने के लिए विख्यात हुईं। उन्होंने अपनी शिक्षा एलेक्जेंड्रा नेटिव गल्र्स संस्थान में प्राप्त की थी और वह शुरू से ही तीव्र बुद्धि वाली और संवेदनशील थी। वे हमेशा ब्रिटिश साम्राज्य विरोधी गतिविधियों में लगी रहती थी। वर्ष 1896 में मुम्बई में प्लेग फैलने के बाद भीकाजी ने इसके मरीजों की सेवा की थी। बाद में वह खुद भी इस बीमारी की चपेट में आ गई थीं। इलाज के बाद वह ठीक हो गई थीं लेकिन उन्हें आराम और आगे के इलाज के लिए यूरोप जाने की सलाह दी गई। वर्ष 1906 में उन्होंने लन्दन में रहना शुरू किया जहां उनकी मुलाक़ात प्रसिद्ध भारतीय क्रांतिकारी श्यामजी कृष्ण वर्मा, हरदयाल और वीर सावरकर से हुई। लंदन में रहते हुए वह दादाभाई नवरोजी की निची सचिव भी थीं। दादाभाई नोरोजी ब्रिटिश हाउस ऑफ़ कॉमन्स का चुनाव लड़ने वाले पहले एशियाई थे। जब वो हॉलैंड में थी, उस दौरान उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर क्रांतिकारी रचनाएं प्रकाशित करायी थी और उनको लोगों तक पहुंचाया भी। वे जब फ्रांस में थी तब ब्रिटिश सरकार ने उनको वापस बुलाने की मांग की थी पर फ्रांस की सरकार ने उस मांग को खारिज कर दिया था। इसके पश्चात ब्रिटिश सरकार ने उनकी भारतीय संपत्ति जब्त कर ली और भीखाजी कामा के भारत आने पर रोक लगा दी। उनके सहयोगी उन्हें भारतीय क्रांति की माता मानते थे, जबकि अंग्रेज उन्हें कुख्यात् महिला, खतरनाक क्रांतिकारी, अराजकतावादी क्रांतिकारी, ब्रिटिश विरोधी तथा असंगत कहते थे।

भीकाजी ने वर्ष 1905 में अपने सहयोगियों विनायक दामोदर सावरकर और श्यामजी कृष्ण वर्मा की मदद से भारत के ध्वज का पहला डिजाइन तैयार किया। भीकाजी द्वारा लहराए गए झंडे में देश के विभिन्न धर्मों की भावनाओं और संस्कृति को समेटने की कोशिश की गई थी। उसमें इस्लाम, हिंदुत्व और बौद्ध मत को प्रदर्शित करने के लिए हरा, पीला और लाल रंग इस्तेमाल किया गया था। साथ ही उसमें बीच में देवनागरी लिपि में ̔वंदे मातरम̕ लिखा हुआ था। भीका जी ने लिंग समानता के लिए भी कार्य किया था। भीकाजी कामा ने 22 अगस्त 1907 को जर्मनी में हुई इंटरनेशनल सोशलिस्ट कांफ्रेंस में भारतीय स्वतंत्रता के ध्वज को बुलंद किया था।

उनके सम्मान में भारत में कई स्थानों और गलियों का नाम उनके नाम पर रखा गया है। 26 जनवरी 1962 में भारतीय डाक ने उनके समर्पण और योगदान के लिए उनके नाम का डाक टिकट जारी किया था। भारतीय तटरक्षक सेना में जहाजों का नाम भी उनके नाम पर रखा गया था। देश की सेवा और स्वतंत्रता के लिए सब कुछ कुर्बान कर देने वाली इस महान महिला की मृत्यु 1936 में मुम्बई के पारसी जनरल अस्पताल में हुयी। उस वक्त उनके मुख से निकले आखिरी शब्द थे  ̔वंदे मातरम

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