विनोबा भावे का जीवन परिचय
‘आचार्य विनोबा भावे’ का जन्म महाराष्ट्र के कोलाबा में 11 सितंबर, 1895 को हुआ था। उनका असली नाम विनायक राव भावे था। उनके पिता का नाम नरहारी शंभू राव था। उनकी मां का नाम रुक्मणि देवी था।
वह एक उच्च जाति ब्राह्मण परिवार में पैदा हुये थे, उन्होंने अहमदाबाद के पास साबरमती में गांधी के आश्रम (तपस्वी समुदाय) में शामिल होने के लिए 1916 में अपने हाईस्कूल अध्ययनों को त्याग दिया। गांधी की शिक्षाओं ने भावे को भारतीय गांव के जीवन में सुधार के लिए समर्पित तपस्या के जीवन का नेतृत्व किया।
1920 और 30 के दशक के दौरान भावे को कई बार ब्रिटिश हुकूमत द्वारा जेल हुई थी और ब्रिटिश शासन के लिए अहिंसक प्रतिरोध के लिए 40 के दशक में पांच साल की जेल की सजा सुनाई गई थी।
उनके पिता, नारहारी शंभू राव एक तर्कसंगत आधुनिक दृष्टिकोण के साथ एक प्रशिक्षित बुनकर थे और वह बड़ौदा में काम किया करते थे। विनायक कर्नाटक की एक धार्मिक महिला और अपनी मां रुक्मिणी देवी से काफी प्रभावित थे। बहुत कम उम्र में भगवत गीता पढ़ने के बाद वह अत्यधिक प्रेरित हुये और वह उसका सार भी समझ गये।
नवनिर्मित बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में गांधी के भाषण के बारे में समाचार पत्रों में छपे एक रिपोर्ट ने विनोबा का ध्यान आकर्षित किया। 1916 में मुंबई के माध्यम से मध्यवर्ती परीक्षा में उपस्थित होने के लिये जा रहे थे पर गाँधी जी के भाषण सुनकर उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी विनोबा भावे ने अपने स्कूल और कॉलेज प्रमाण पत्रों को आग में डाल दिया।
विनोबा भावे, गाँधी जी से 7 जून 1916 को पहली बार मिले, और वह उनकी बातों से वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपना समस्त जीवन उनकी राह में चलते हुये, देश की सेवा में लगा दिया।
स्वतंत्रता संग्राम में योगदान
वह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महात्मा गांधी से जुड़े थे। वह कुछ समय के लिए गांधी के साबरमती आश्रम में एक कुटीर बनाकर रहे, जिसका नाम उनके नाम पर रखा गया, ‘विनोबा कुटीर’।वहां उन्होंने गीता पर अपनी मूल भाषा मराठी में अपने साथीयों को कई वार्ताएं दीं। बाद में इन बेहद प्रेरणादायक वार्ता को “टॉक ऑन द गीता(Talk on the Gita)” किताब के रूप में प्रकाशित किया गया था और इसका अनुवाद भारत और अन्य जगहों पर कई भाषाओं में किया गया।
1940 में गांधी जी ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ पहली व्यक्तिगत रूप से सत्याग्रह में (एक सामूहिक कार्रवाई के बजाय सत्य के लिए खड़े किये जाने वाले पहले व्यक्ति) के रूप में चुना गया था। ऐसा कहा जाता है कि गांधी ने भावे की ब्रह्मचर्य को, ब्रह्मचर्य सिद्धांत में अपनी धारणा के अनुरूप अपने किशोरावस्था में एक प्रतिज्ञा की और सम्मान दिया। भावे ने भारत छोड़ो आंदोलन में भी भाग लिया।
जेल यात्रा
जब हमारे देश में अंग्रेजों का शासन हुआ करता था उस समय गाँधी जी जनता को जागृत करने में लगे थे और उन पर देश को आज़ाद कराने जैसी कुछ जिम्मेदारियां भी थी। उनके इन सभी कार्यों में आचर्य भी शामिल थे।
मृत्यु
विनोबा भावे एक विद्वान थे। वह अठारह भाषाओं को जानते थे। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि की कई किताबें लिखीं। 1958 में विनोबा सामुदायिक नेतृत्व के लिए अंतरराष्ट्रीय रेमन मैग्सेसे पुरस्कार के पहले प्राप्तकर्ता थे। उन्हें मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया है। विनोबा भावे की मृत्यु 15 नवंबर 1982 को 87 वर्ष की आयु में हुई थी। वह एक आध्यात्मिक दूरदर्शी थे।
