Sunday, 11 October 2020

धोंडो केशव कर्वे की जीवनी


 धोंडो केशव कर्वे की जीवनी 

परिचय

डॉ. धोंडो केशव कर्वे को ‘महर्षि कर्वे’ के नाम से भी जाता है, उन्हें आधुनिक भारत का सबसे बड़ा समाज सुधारक और उद्धारक माना जाता है। उन्होंने अपना पूरा जीवन संघर्षों से लड़ने तथा समाज सेवा करते हुए समाप्त कर दिया। धोंडो केशव कर्वे ने अपने कथन ‘जहाँ चाह, वहाँ राह’ को सर्वथा सत्य सिद्ध कर दिया।

जन्म

धोंडो केशव कर्वे का जन्म 18 अप्रॅल, 1858 को महाराष्ट्र के रत्नागिरि ज़िले के ‘मुरूड़’ नामक गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री केशव पंत था। उनके माता-पिता बहुत ही स्वाभिमानी और उच्च विचारों वाले थे, किंतु उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। वे अपने पुत्र को शिक्षित और संस्कारवान बनाना चाहते थे, किंतु अपनी गरीबी के कारण ज्यादा कुछ नहीं कर पाए।

शिक्षा

धोंडो केशव कर्वे की शुरूआती शिक्षा गांव में ही प्राइमरी स्कूल में हुई थी। कुछ समय बाद उन्होंने घर पर रहकर ही पढ़ाई की। शिक्षा प्राप्त करने के लिए उन्हें बचपन में संघर्षों का सामना करना पड़ा, 8वीं की परीक्षा पास करने के लिए उन्हें अपनी नियमित पढ़ाई छोड़कर गांव से दूर कोल्हापुर जाकर स्वतंत्र परीक्षार्थी के रूप में परीक्षा दी।

सन 1881 में धोंडो केशव कर्वे ने मुम्बई के ‘रॉबर्ट मनी स्कूल’ से हाई स्कूल की परीक्षा पास की। उसके बाद मुम्बई के ‘एलफिंस्टन कॉलेज’ से सन् 1884 में गणित विषय में विशेष योग्यता के साथ स्नातक की परीक्षा पास की। अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए उन्होंने आगे की पढ़ाई बंद करते हुए, अपनी योग्यता के आधार पर ‘मराठा स्कूल’ में पढ़ाना शुरू किया।

प्रारंभिक जीवन

धोंडो केशव कर्वे जब सिर्फ 15 साल के थे, तभी उनकी शादी हो गई। एक तरफ कम आयु में शादी और दूसरी तरफ शिक्षा प्राप्ति के लिए संघर्ष करना पड़ा। इतना होने पर भी उनमें समाज सुधार के प्रति गहरी रुचि दिखायी देने लगी। उनके गांव के ही कुछ विद्वान् लोगों ने उनके मन में समाज सेवा के प्रति भावना को उत्पन्न करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके समाज सेवा के गुण दिन प्रतिदिन निखरते चले गये।

धोंडो केशव कर्वे सन् 1891 में गोपालकृष्ण गोखले, दादा भाई नौरोजी और महादेव गोविंद रानाडे जैसे महापुरुषों के पद चिह्नों पर चलते हुए समाज सेवा के क्षेत्र में कुछ अच्छा करने की योजना बना रहे थे, तभी उनकी पत्नी ‘राधाबाई’ का देहान्त हो गया। सन् 1891 के अंतिम माह में वे राष्ट्रवादी नेताओं द्वारा संचालित पूना के ‘फर्ग्युसन कॉलेज’ में गणित के प्राध्यापक के पद पर नियुक्त किए गए। अपनी मेहनत और प्रतिभा के बल पर वे ‘डेक्कन शिक्षा समिति’ के आजीवन सदस्य बने।

कार्यक्षेत्र

धोंडो केशव कर्वे ने फर्ग्युसन कॉलेज में अध्यापन करते समय समाज सुधार के क्षेत्र में कदम रखा। उन्होंने सन् 1893 में अपने मित्र की विधवा बहन ‘गोपूबाई’ से शादी की। शादी के बाद गोपूबाई का नया नाम ‘आनंदीबाई’ हुआ। उनके इस कार्य के कारण सारे महाराष्ट्र में विशेषकर उनकी बिरादरी में विरोध पैदा हो गया। इसी विरोध ने धोंडो केशव कर्वे को समाज द्वारा उपेक्षित विधवाओं के उद्धार तथा पुनर्वास के लिए प्रेरित किया।

धोंडो केशव कर्वे महात्मा गाँधी द्वारा चलाई गयी नई शिक्षा नीति और महाराष्ट्र समाज सुधार समिति के कार्यों में भी व्यस्त रहे। देश के जाने-माने समाज सुधारकों को जब उनके द्वारा विधवाओं के उद्धार के लिए किए जाने वाले कार्यों का पता चला तो उन्होंने उनके कार्यों की प्रशंसा की।

धोंडो केशव कर्वे ने सन् 1896 में पूना के हिंगले नामक स्थान पर दान में मिली जमीन पर विधवा आश्रम और अनाथ बालिका आश्रम की स्थापना की। धीरे-धीरे धनी और दयालु लोग उनके कार्यों से प्रभावित होकर सहयोग करने लगे।

धोंडो केशव कर्वे ने सन् 1907 में ‘महिला विद्यालय’ की स्थापना की। जब उन्होंने विधवा और अनाथ बालिकाओं के इस विद्यालय को सफल होते देखा, तो उन्होंने इस काम को आगे बढ़ाते हुए ‘महिला विश्वविद्यालय’ की योजना पर भी विचार करना शुरू कर दिया।

धोंडो केशव कर्वे के प्रयासों और महाराष्ट्र के धनी व्यक्यिों द्वारा दान में दिए गए रूपयों के सहयोग से सन् 1916 में ‘महिला विश्वविद्यालय’ की नींव रखी गयी। धोंडो केशव कर्वे के मार्ग दर्शन में यह विश्वविद्यालय विधवाओं को समाज में पुनर्स्थापित करने और आत्मनिर्भर बनाने का संस्थान बन गया।

विदेशी यात्रा

धोंडो केशव कर्वे ने सन 1931- 32 में महिला विश्वविद्यालय के संस्थापक और कुलपति के रूप में इंग्लैंड, जापान, अमेरिका, अफ्रीका समेत कई देशों की यात्राएं की। इस यात्रा काल में जहाँ उन्होंने विदेशों में महिला विश्वविद्यालयों की कार्य प्राणाली का अध्ययन किया, वहीं वे विश्व के प्रसिद्ध विद्वानों से भी मिले।

महान कार्य

धोंडो केशव कर्वे ने केवल महिला विश्वविद्यालय या महिलाओं के पुनरोत्थान के लिए ही नहीं, बल्कि ‘इंडियन सोशल कॉंफ्रेंस’ के अध्यक्ष के रूप में समाज में मौजूद बुराइयों को खत्म करने में भी योगदान दिया। वे एक महान् सुधारक होने के साथ-साथ एक अच्छे शिक्षा शास्त्री भी थे। गांवों में शिक्षा को आसान बनाने के लिए उन्होंने चंदा इकट्ठा कर लगभग 50 से भी ज्यादा प्राइमरी स्कूलों की स्थापना की।

सम्मान

धोंडो केशव कर्वे के द्वारा सन 1942 में स्थापित विश्वविद्यालय की रजत जयंती मनायी गयी। महान् विद्वान् और शिक्षाविद सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने इस समारोह की अध्यक्षता की। इसी साल उनको बनारस विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टरेट की मानद उपाधि से पुरस्कृत किया गया।

धोंडो केशव कर्वे के विश्वविद्यालय को सन् 1951 में ‘राष्ट्रीय विश्वविद्यालय’ का दर्ज़ा प्राप्त हुआ। इसी साल पूना विश्वविद्यालय ने महर्षि कर्वे को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की। उनके महान् समाज सुधार के कार्यों के फलस्वरूप सन् 1955 में भारत सरकार द्वारा उन्हें ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया गया। इसी साल ‘श्रीमती नत्थीबाई भारतीय महिला विश्वविद्यालय’ द्वारा उन्हें डी.लिट. की उपाधि प्रदान की गयी।

भारत रत्न

सन 1958 में धोंडो केशव कर्वे ने जब अपने जीवन के 100 साल पूरे किए, तब देश भर में उनकी जन्म शताब्दी मनायी गयी। इस मौके को यादगार बनाते हुए भारत सरकार द्वारा इसी वर्ष उन्हें ‘भारत रत्न’ से विभूषित किया। उनके सम्मान और स्मृति में भारत सरकार द्वारा एक डाक टिकट भी ज़ारी किया गया।

मृत्यु

धोंडो केशव कर्वे ने 105 वर्ष की दीर्घ आयु प्राप्त कर 9 नवंबर सन् 1962 को इस दुनिया से विदा ली।

चित्तरंजन दास का जीवन परिचय


 चित्तरंजन दास का जीवन परिचय

पूरा नाम  – चित्तरंजन भुवनमोहन दास
जन्म       – 5 नवंबर 1870
जन्मस्थान – कोलकता
पिता       – भुवनमोहन
माता       – निस्तारिणी देवी
शिक्षा      – इ.स. 1890 में प्रेसिडेन्सी कॉलेज कोलकता सें बी.ए.
इ.स.1892 में लंडनसे बॅरिस्टर की उपाधी।
विवाह      – वासंतीदेवी के साथ (इ.स. 1897 में)

चित्तरंजन दास का संबंध ढाका (वर्तमान बांग्लादेश) के बिक्रमपुर के, तेलिर्बघ (बैद्य-ब्राह्मण) के दास परिवार से था। वे भुबन मोहन दास के बेटे और ब्रह्म सामाजिक सुधारक दुर्गा मोहन दास के भांजे थे। उनके भाई-बहनों में सतीश रंजन दास, सुधि रंजन दास, सरला रॉय और लेडी अबला बोस शामिल है। उनका सबसे बड़ा पोता सिद्धार्थ शंकर राय और उनकी पोती का नाम मंजुला बोस है।

इंग्लैंड में चित्तरंजन दास ने अपनी पढाई पूरी की और बैरिस्टर बने। उनका सामाजिक करियर 1909 में शुरू हुआ था जब उन्होंने पिछले वर्ष के अलिपोरे बम केस में औरोबिन्दो घोष के शामिल होने का विरोध कर उनकी रक्षा की थी। बाद में अपने भाषण में औरोबिन्दो ने चित्तरंजन दास की तारीफ करते हुए कहा था की चित्तरंजन ने अपनी सेहत की परवाह किये बिना ही उनकी रक्षा की थी।

बंगाल में 1919-1922 के बीच हुए असहकार आन्दोलन के समय दास बंगाल के मुख्य नेताओ में से एक थे। उन्होंने ब्रिटिश कपड़ो का भी काफी विरोध किया। इसका विरोध करते हुए उन्हें खुद ही के यूरोपियन कपड़ो को जलाया और खादी कपडे पहनने लगे थे। एक समय उनके कपडे पेरिस में सिले और धोए जाते थे और पेरिस में उन्होंने अपने कपड़ो की शिपिंग कलकत्ता में करने के लिये एक लांड्री भी स्थापित कर रखी थी। लेकिन जब दास स्वतंत्रता अभियान से जुड़ गए थे तब उन्होंने इन सारी सुख-सुविधाओ का त्याग किया था।

उन्होंने एक अखबार फॉरवर्ड भी निकाला और फिर बाद में उसका नाम बदलकर लिबर्टी टू फाइट दी ब्रिटिश राज रखा। जब कलकत्ता म्युनिसिपल कारपोरेशन की स्थापना की गयी थी तब दास ही पहले महापौर बने थे। उनका अहिंसा और क़ानूनी विधियों पर पूरा भरोसा था। उन्हें भरोसा था की इन्ही के बल पर हम आज़ादी पा सकते है और हिन्दू-मुस्लिम में एकता भी ला सकते है। बाद में उन्होंने स्वराज्य पार्टी की भी स्थापना मोतीलाल नेहरु और युवा हुसैन शहीद सुहरावर्दी के साथ मिलकर 1923 में की थी। ताकि वे अपने विचारो को लोगो के सामने ला सके।

उनके विचारो और उनकी महानता को उनके शिष्य आगे ले गए और विशेषतः सुभास चन्द्र बोस उनके ही विचारो पर चलने लगे थे।

उनके देशप्रेमी विचारो को देखते हुए उन्हें देशबंधु की संज्ञा दी गयी थी। वे भारतीय समाज से पूरी तरह जुड़े हुए थे और कविताये भी लिखते थे और अपने असंख्य लेखो और निबंधो से उन्होंने लोगो को प्रेरित किया था। उन्होंने बसंती देवी (1880-1974) से विवाह किया था और उनकी तीन संताने भी हुई अपर्णा देवी (1898-1972), चिरंजन दास (1899-1928) और कल्याणी देवी (1902-1983)।

चित्तरंजन दास के साथ बसंती देवी ने भी स्वतंत्रता अभियान में सहायता की थी। उनकी भाभी उर्मिला देवी असहकार आन्दोलन में 1921 में कोर्ट अरेस्ट होने वाली पहली महिला थी। सभी के प्रति जोश और आकर्षण के बल पर बसंती देवी भी स्वतंत्रता अभियान का जाना माना चेहरा बन चुकी थी। नेताजी सुभास चन्द्र बोस उन्हें माँ कहकर बुलाते थे।

1925 में लगातार ज्यादा काम करते रहने की वजह से चित्तरंजन दास की सेहत धीरे-धीरे बिगड़ने लगी थी और इसीलिए उन्होंने कुछ समय के लिये अलग होने ला निर्णय लिया और दार्जिलिंग में पर्वतो पर बने अपने घर में रहने लगे, जहाँ महात्मा गांधी भी अक्सर उन्हें देखने के लिये आते थे। 16 जून 1925 को ज्यादा बुखार होने की वजह से ही उनकी मृत्यु हो गयी थी। उनके शव को ट्रेन से कलकत्ता ले जाने की उस समायी विशेष व्यवस्था की गयी थी।

कलकत्ता में उनका अंतिम संस्कार गांधीजी ने किया था और वहाँ उन्होंने कहा थी की:

“देशबंधु देश के महानतम देशप्रेमियो में से एक थे… उन्होंने आज़ाद भारत का सपना देखा था… और भारत की आज़ादी के लिये ही वे बोलते थे और कुछ भी उनकी जिंदगी में नही था…. उनका दिल भी हिन्दू और मुसलमान में कोई भेदभाव नही करता था और साथ ही मै गोरो को भी इसमें शामिल करना चाहूँगा, किसी भी इंसान के साथ वे भेदभाव नही करते थे।”

देशबंधु की उपाधि से माने जाने वाले चित्तरंजन दास भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के प्रभावी नेता थे। चित्तरंजन दास स्वभाव से ईमानदार और विनम्र थे। अपने ऐश्वर्यपूर्ण जीवन को उन्होंने त्याग दिया। वे एक यथार्थवादी नेता थे। देश के प्रति उनके अटूट प्रेम के कारण ही उन्हें देशबंधु कहा जाता था। वे अपने सिद्धांतो के पक्के, सच्चे राष्ट्रभक्त और मानवतावादी धर्म के पक्षधर थे। भारतवर्ष इतिहास में उनके योगदान को हमेशा याद रखेंगा।

एक नजर में  चित्तरंजन दास की जीवनी – Short information about Chittaranjan Das

  • इंग्लंड के पार्लमेंट में चित्तरंजन दास ने भारतीय प्रतिनिधी के लिये आयोजित चुनाव के लिये दादाभाई नौरोजी का प्रचार किया जिसमें दादाभाई जित गयें।
  • इ.स. 1894 में चित्तरंजन दास ने कोलकता उच्च न्यायलय में वकीली की।
  • इ.स. 1905 में चित्तरंजन दास स्वदेशी मंडलकी स्थापना की।
  • इ.स. 1909 में अलीपुर बॉम्बे मामले में अरविंद घोष की और से वे न्यायलय में लढे। इसलिये अरविंद घोष निर्दोष छूट पायें।
  • इ.स. 1914 में ‘नारायण’ नाम से’ बंगाली भाषा का साप्ताहिक उन्होंने शुरु किया।
  • इ.स. 1917 में बंगाल प्रांतीय राजकीय परिषद के अध्यक्ष थे।
  • इ.स. 1921 और इ.स. 1922 में अहमदाबाद में भारतीय राष्ट्रीय कॉग्रेस के अध्यक्ष रहे।
  • चित्तरंजन दास ने मोतीलाल नेहरू, मदन मोहन मालवीय के साथ स्वराज्य पक्ष की स्थापना की।
  • ‘फॉरवर्ड’ दैनिक में वो लेख लिखने लगे, उन्होने ही इसका प्रकाशन किया।
  • इ.स. 1924 में वे कोलकता महापालिका कें अध्यक्ष हुये।

विशेषता:

 खुद की सब संपत्ति उन्होंने मेडिकल कॉलेज और स्त्रियाओ के अस्पताल के लिये दी। इसलिये लोग उनको ‘देशबंधू’ इस नामसे पहचानने लगे।

मृत्यु: 16 जून 1925 में उनकी मौत हुयी।

बारीन्द्र कुमार घोष


 बारीन्द्र कुमार घोष  

बारीन्द्र कुमार घोष जन्म: 5 जनवरी, 1880; मृत्यु: 18 अप्रैल, 1959) भारत के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी तथा पत्रकार थे। इनको बारिन घोष के नाम से भी जाना जाता है। वे अध्यात्मवादी अरविंद घोष के छोटे भाई थे। बंगाल में क्रांतिकारी विचारधारा को फैलाने का श्रेय बारीन्द्र कुमार और भूपेन्द्र नाथ दत्त, जो कि स्वामी विवेकानंद के छोटे भाई थे, को ही जाता है। 'स्वदेशी आंदोलन' के परिणामस्वरूप बारीन्द्र कुमार घोष ने क्रांतिकारी विचारों का प्रचार करने के लिए 1906 में बंगाली साप्ताहिक 'युगान्तर' का प्रकाशन प्रारम्भ किया। उन्होंने 1907 में क्रांतिकारी आतंकवाद की गतिविधियों का संयोजन करने के लिए 'मणिकतल्ला पार्टी' का गठन भी किया था। 1908 में इन्हें गिरफ़्तार कर मृत्यु दण्ड की सजा सुनाई गई, किन्तु बाद में इसे आजीवन कारावास में बदल दिया गया। अण्डमान जेल में दस वर्ष व्यतीत करने के बाद इन्होंने अपना शेष समय पत्रकारिता में लगाया। बारीन्द्र कुमार घोष बंगाली दैनिक 'द स्टेट्समैन' और 'वसुमित्र' से भी जुड़े थे।

परिचय

बारीन्द्र कुमार घोष का जन्म 5 जनवरी, 1880 को लन्दन के पास 'क्रोयदन नामक कसबे में हुआ था। उनके पिता कृष्णनाधन घोष एक नामी चिकित्सक व प्रतिष्ठित ज़िला सर्जन थे जबकि उनकी माता देवी स्वर्णलता प्रसिद्ध समाज सुधारक व विद्वान् राजनारायण बासु की पुत्री थीं। अरविन्द, जो की पहले क्रन्तिकारी और फिर अध्यात्मवादी हो गए थे, उनके तीसरे बड़े भाई थे जबकि उनके दूसरे बड़े भाई मनमोहन घोष अंग्रेज़ी साहित्य के विद्वान, कवि और कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) के प्रेसिडेंसी कॉलेज व ढाका यूनिवर्सिटी में अंग्रेज़ी के प्रोफ़ेसर थे। बारीन्द्र कुमार घोष की स्कूली शिक्षा देवगढ़ में हुई व 1901 में प्रवेश परीक्षा पास करके उन्होंने पटना कॉलेज में दाखिला लिया। बरोड़ा में उन्होंने मिलिट्री ट्रेनिंग ली। इसी समय अरविन्द घोष से प्रभावित होकर उनका झुकाव क्रांतिकारी आन्दोलन की तरफ़ हुआ

क्रांतिकारी गतिविधियाँ

सन 1902 में बारीन्द्र कुमार घोष कलकत्ता वापस आ गये थे और जतिन्द्रनाथ दास के साथ मिलकर बंगाल में अनेक क्रांतिकारी समूहों को संगठित करना शुरू कर दिया।

अनुशीलन समिति

बारीन्द्र कुमार घोष और भूपेन्द्रनाथ दत्त के सहयोग से 1907 में कलकत्ता में 'अनुशीलन समिति' का गठन किया गया, जिसका प्रमुख उद्देश्य था- "खून के बदले खून।" 1905 के बंगाल विभाजन ने युवाओं को आंदोलित कर दिया था, जो की अनुशीलन समिति की स्थापना के पीछे एक प्रमुख वजह थी। इस समिति का जन्म 1903 में ही एक व्यायामशाला के रूप में हो गया था और इसकी स्थापना में प्रमथनाथ मित्र और सतीश चन्द्र बोस का प्रमुख योगदान था। एम. एन. राय के सुझाव पर इसका नाम अनुशीलन समिति रखा गया। प्रमथनाथ मित्र इसके अध्यक्ष, चितरंजन दास व अरविन्द घोष इसके उपाध्यक्ष और सुरेन्द्रनाथ ठाकुर इसके कोषाध्यक्ष थे। इसकी कार्यकारिणी की एकमात्र शिष्य सिस्टर निवेदिता थीं। 1906 में इसका पहला सम्मलेन कलकत्ता में सुबोध मालिक के घर पर हुआ। बारीन्द्र कुमार घोष जैसे लोगों का मानना था की सिर्फ राजनीतिक प्रचार ही काफ़ी नहीं है, नोजवानों को आध्यात्मिक शिक्षा भी दी जानी चाहिए। उन्होंने अनेक जोशीले नोजवानों को तैयार किया जो लोगों को बताते थे कि स्वतंत्रता के लिए लड़ना पावन कर्तव्य है।

सज़ा

बारीन्द्र कुमार घोष और बाघ जतिन ने पूरे बंगाल से अनेक युवा क्रांतिकारियों को खड़ा करने में निर्णायक भूमिका अदा की। क्रांतिकारियों ने कलकत्ता के मनिक्तुल्ला में 'मनिक्तुल्ला समूह' बनाया। यह उनका एक गुप्त स्थान था, जहाँ वे बम बनाते और हथियार इकठ्ठा करते थे। 30 अप्रैल 1908 को खुदीराम बोस और प्रफुल्लचंद चाकी ने किंग्स्फोर्ड की हत्या का प्रयास किया, जिसके फलस्वरूप पुलिस ने बहुत तेजी से क्रांतिकारियों की धर-पकड़ शुरू कर दी और दुर्भाग्य से 2 मई 1908 को बारीन्द्र कुमार घोष को भी उनके कई साथियों सहित गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर 'अलीपुर बम केस' चलाया गया और प्रारंभ में ही उन्हें मृत्युदंड की सजा दे दी गयी, परन्तु बाद में उसे आजीवन कारावास कर दिया गया। उन्हें अंडमान की भयावह सेल्युलर जेल में भेज दिया गया, जहाँ वह 1920 तक क़ैद रहे।

रिहाई तथा पत्रकारिता

बारीन्द्र कुमार घोष को 1920 में प्रथम विश्व युद्ध के बाद दी गयी 'आम क्षमा'[3] में रिहा कर दिया गया, जिसके बाद वह कलकत्ता आ गए और पत्रकारिता प्रारंभ कर दी। किन्तु जल्द ही उन्होंने पत्रकारिता भी छोड़ दी और कलकत्ता में आश्रम बना लिया। 1923 में वह पॉडिचेरी चले गए, जहाँ उनके बड़े भाई अरविन्द घोष ने प्रसिद्ध 'श्री औरोविंद आश्रम' बनाया था। अरविन्द ने उन्हें आध्यात्म और साधना के प्रति प्रेरित किया, जबकि ठाकुर अनुकुलचंद उनके गुरु थे। इन्होंने ही अपने अनुयायियों द्वारा बरीं की सकुशल रिहाई में मदद की थी। 1929 में बारीन्द्र कुमार घोष दोबारा कलकत्ता आये और पत्रकारिता शुरू कर दी। 1933 में उन्होंने "The Dawn of India" नामक अंग्रेज़ी साप्ताहिक पत्र शुरू किया। वह 'the statesman' से जुड़े रहे और 1950 में बांगला दैनिक 'दैनिक बसुमती' के संपादक हो गए। रचनाएँ

बारीन्द्र कुमार घोष ने अनेक पुस्तकों की भी रचना की, जैसे-

  1. द्वीपांतर बंशी
  2. पाथेर इंगित 
  3. अमर आत्मकथा
  4. अग्नियुग
  5. ऋषि राजनारायण 
  6. द टेल ऑफ़ माई एक्साइल 
  7. श्री अरविन्द 
  8. मृत्यु

    18 अप्रैल, 1959 को महान् सेनानी बारीन्द्र कुमार घोष का देहांत हो गया।

अरविन्द घोष

 


अरविन्द घोष

जन्म: अगस्त 15, 1872

निधन: दिसंबर 5, 1950

उपलब्धियां: स्वतंत्रता सेनानी, कवि, प्रकांड विद्वान, योगी और महान दार्शनिक

अरविंद घोष एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे। वह एक स्वतंत्रता सेनानी, कवि, प्रकांड विद्वान, योगी और महान दार्शनिक थे। उन्होंने अपना जीवन भारत को आजादी दिलाने और पृथ्वी पर जीवन के विकास की दिशा में समर्पित कर दिया।

अरविंद के पिता का नाम केडी घोष और माता का नाम स्वमलता था। अरविन्द घोष एक प्रभावशाली वंश से सम्बन्ध रखते थे। राज नारायण बोस, बंगाली साहित्य के एक जाने माने नेता, श्री अरविंद के नाना थे। अरविंद घोष ना केवल आध्यात्मिक प्रकृति के धनी थे बल्कि उनकी उच्च साहित्यिक क्षमता उनकी माँ की शैली की थी। उनके पिता एक डॉक्टर थे।

जब अरविन्द घोष पांच साल के थे उन्हें दार्जिलिंग के लोरेटो कान्वेंट स्कूल में भेज दिया गया। दो साल के बाद 1879 में अरविन्द घोष को उनके भाई के साथ उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेज दिया गया। अरविन्द ने अपनी पढाई लंदन के सेंट पॉल से पूरी की। वर्ष 1890 में 18 साल की उम्र में अरविन्द को कैंब्रिज में प्रवेश मिल गया। यहाँ पर उन्होंने स्वयं को यूरोपीय क्लासिक्स के एक छात्र के रूप में प्रतिष्ठित किया। अपने पिता की इच्छा का पालन करने के लिए, उन्होंने कैम्ब्रिज में रहते हुए आईसीएस के लिए आवेदन भी दिया। उन्होंने 1890 में पूरे विश्वास के साथ भारतीय सिविल सेवा परीक्षा उत्तीर्ण की। हांलांकि वह घुड़सवारी के एक आवश्यक इम्तेहान में खरे उतरने में विफल रहे और इसलिए उन्हें भारत सरकार की सिविल सेवा में प्रवेश की अनुमति नहीं मिली।

वर्ष 1893 में अरविन्द घोष भारत वापस लौट आये और बड़ौदा के एक राजकीय विद्यालय में उपप्रधानाचार्य बन गए। उन्हें 750 रुपये वेतन दिया गया। उन्हें बड़ौदा के महाराजा द्वारा बहुत सम्मान मिला। अरविन्द घोष को ग्रीक और लैटिन भाषाओ में निपुणता प्राप्त थी। 1893 से 1906 तक उन्होंने संस्कृत, बंगाली साहित्य, दर्शनशास्त्र और राजनीति विज्ञान का विस्तृत रूप से अध्यन किया।

1906 में बंगाल के विभाजन के बाद उन्होंने अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया और 150 रूपए के वेतन पर बंगाल नेशनल कॉलेज में शामिल हो गए। इसके बाद वो क्रांतिकारी आंदोलन में तेज़ी से सक्रीय हो गए। अरविन्द घोष ने 1908 से भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक प्रमुख भूमिका निभाई। अरविंद घोष भारत की राजनीति को जागृति करने वाले मार्गदर्शकों में से एक थे। उन्होंने अंग्रेजी दैनिक ‘वन्दे मातरम’ पत्रिका का प्रकाशन किया और निर्भीक होकर तीक्ष्ण सम्पादकीय लेख लिखे। उन्होंने ब्रिटिश सामान, ब्रिटिश न्यायलय और सभी ब्रिटिश चीजों के बहिष्कार का खुला समर्थन किया । उन्होंने लोगों से सत्याग्रह के लिए तैयार रहने के लिए कहा ।

प्रसिद्ध अलीपुर बम केस अरविंद घोष के जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। एक वर्ष के लिए अरविन्द अलीपुर सेंट्रल जेल के एकान्त कारावास में एक विचाराधीन कैदी रहे। वह अलीपुर जेल की एक गंदे सेल में थे जब उन्होंने अपने भविष्य के जीवन का सपना देखा जहाँ भगवान ने उन्हें एक दिव्य मिशन पर जाने का आदेश दिया। उन्होंने क़ैद की इस अवधि का उपयोग गीता की शिक्षाओं का गहन अध्ययन और अभ्यास के लिए किया। चित्तरंजन दास ने श्री अरविन्द का बचाव किया और एक यादगार सुनवाई के बाद उन्हें बरी कर दिया गया।

अपने कारावास के दौरान अरविंद घोष ने योग और ध्यान में अपनी रुचि को विकसित किया। अपनी रिहाई के बाद उन्होंने प्राणायाम और ध्यान का अभ्यास शुरू कर दिया 1910 में श्री अरविंद घोष कलकत्ता छोड़ पांडिचेरी में बस गए। पांडिचेरी में वह अपने एक दोस्त के घर पर रुके। शुरुआत में वह अपने चार से पांच साथियों के साथ रहे। फिर धीरे धीरे सदस्यों की संख्या में वृद्धि हुई और एक आश्रम की स्थापना हुई ।

पांडिचेरी में चार साल तक योग पर अपना ध्यान केंद्रित करने के बाद वर्ष 1914 में श्री अरविन्द ने आर्य नामक दार्शनिक मासिक पत्रिका का शुभारम्भ किया। अगले साढ़े 6 सालों तक यह उनकी सबसे महत्वपूर्ण रचनाओं में से ज्यादातर के लिए एक माध्यम बन गया जो कि एक धारावाहिक के रूप में आयीं। इनमे गीता का वर्णन, वेदों का रहस्य, उपनिषद, द रेनेसां इन इंडिया, वार एंड सेल्फ डिटरमिनेसन, द ह्यूमन साइकिल, द आइडियल ऑफ़ ह्यूमन यूनिटी और द फ्यूचर पोएट्री शामिल थीं। 1926 में श्री अरविन्द सार्वजनिक जीवन से सेवानिवृत्त हो गए।

श्री अरविंद के दर्शनशास्त्र तथ्य, अनुभव, व्यक्तिगत आभाष और एकद्रष्टाया ऋषि की दृष्टि होने पर आधारित है। अरबिंदो की आध्यात्मिकता अभिन्नताओं के कारण एक जुट थी। श्री अरविंद का लक्ष्य केवल किसी व्यक्ति को उन बेड़ियों से जो उन्हें जकड़े हुए थीं और इस के एहसास से मुक्त करना नहीं था बल्कि दुनिया में परमात्मा की इच्छा को सम्पन्न करना, एक आध्यात्मिक परिवर्तन लागू करना और मानसिक, मार्मिक, भौतिक जगत और मानव जीवन में दिव्यशक्ति और दिव्य आत्मा को लाना था।

श्री अरविन्द का देहांत 5 दिसंबर 1950 को पांडिचेरी में 78 वर्ष की आयु में हो गया।

Saturday, 10 October 2020

डॉ. जाकिर हुसैन

 

डॉ. जाकिर हुसैन

जन्म: 8 फरवरी, 1897, हैदराबाद, तेलन्गाना

मृत्यु: 3 मई, 1969, दिल्ली

कार्य: भारत के तीसरे राष्ट्रपति

जाकिर हुसैन का बचपन और प्रारंभिक जीवन

डॉ. जाकिर हुसैन का जन्म तेलन्गाना के हैदराबाद में 8 फरवरी, 1897 में हुआ था. जन्म के बाद उनका परिवार उत्तर प्रदेश के फरुक्खाबाद जिले के कायमगंज में बस गया. यद्यपि उनका जन्म भारत में हुआ था, परन्तु उनके परिवार के पुराने इतिहास को देखा जाय तो ये वर्तमान पश्तून जनजाति वाले पाकिस्तान और अफगानिस्तान के सीमावर्ती इलाकों से सम्बन्ध रखते थे. यह भी कहा जाता है कि उनके पूर्वज 18वीं शताब्दी के दौरान वर्तमान पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आकर बस गए थे. जब वह केवल 10 वर्ष के थे तो उनके पिता चल बसे और 14 वर्ष की उम्र में उनकी माँ का निधन हो गया था. युवा जाकिर ने इटावा में इस्लामिया हाई स्कूल से अपनी प्रारम्भिक स्कूली शिक्षा पूरी की. बाद में उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा के लिए अलीगढ़ में एंग्लो-मुहम्मडन ओरिएंटल कॉलेज (जो आजकल अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के रूप में जाना जाता है) में दाखिला लिया. यहीं से उन्होंने एक युवा सुधारवादी राजनेता के रूप में अपने कैरियर की शुरुआत की.

एक भारतीय राष्ट्रवादी के रूप में योगदान

डॉ. जाकिर हुसैन 13 मई, 1967 से 3 मई, 1969 तक स्वतंत्र भारत के तीसरे राष्ट्रपति रहे. डॉ. जाकिर हुसैन भारत में आधुनिक  शिक्षा के सबसे बड़े समर्थकों में से एक थे और उन्होंने अपने नेतृत्व में राष्ट्रीय मुस्लिम विश्वविद्यालय को स्थापित किया. उनके द्वारा स्थापित राष्ट्रीय मुस्लिम विश्वविद्यालय आजकल जामिया मिलिया इस्लामिया के नाम से एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय के रूप में नई दिल्ली में मौजूद  है, जहाँ से हजारों छात्र प्रत्येक वर्ष अनेक विषयों में शिक्षा ग्रहण करते हैं. डॉ. जाकिर हुसैन ने बिहार के राज्यपाल के रूप में भी सेवा की थी और इसके बाद वे अपना राजनीतिक कैरियर समाप्त होने से पहले वे देश के उपराष्ट्रपति रहे तथा बाद में वे भारत के तीसरे राष्ट्रपति भी बने.

बीच के वर्षों की गतिविधियां

जाकिर हुसैन को अलीगढ़  के एंग्लो-मुहम्मडन ओरिएंटल कॉलेज में अध्ययन के वर्षों के दौरान से ही एक छात्र नेता के रूप में पहचान मिली। राजनीति के साथ-साथ उनकी दिलचस्पी उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी थी. अपनी औपचारिक उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद वे 29 अक्टूबर, 1920 को उन्होंने कुछ छात्रों और शिक्षकों के साथ मिलकर अलीगढ़ में राष्ट्रीय मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना की (वर्ष 1925 में यह यूनिवर्सिटी करोल बाग, नई दिल्ली में  स्थानांतरित हो गयी. दस वर्षों बाद यह फिर से यह जामिया नगर, नई दिल्ली में स्थायी रूप से स्थानांतरित कर दी गयी और इसका नाम जामिया मिलिया इस्लामिया रखा गया था). इस समय उनकी मात्र 23 साल थी.

जाकिर हुसैन की गहरी रुचि और समर्पण, राजनीति की तुलना में शिक्षा के प्रति अधिक था, जिसका स्पष्ट प्रमाण उनका अर्थशास्त्र में पीएचडी की डिग्री के लिए जर्मनी जाना था. जब वे बर्लिन विश्वविद्यालय में थे तो उन्होंने प्रसिद्ध उर्दू शायर मिर्जा खान गालिब के कुछ अच्छे शायरियों का संकलन किया था. जाकिर हुसैन का विचार था कि शिक्षा का मकसद अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई के दौरान भारत की मदद के लिए मुख्य उपकरण के रूप उपयोग करना था। वास्तव में जाकिर हुसैन का भारत में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लक्ष्य के प्रति इतना समर्पण था कि वे अपने प्रबल राजनीतिक विरोधी मोहम्मद अली जिन्ना का भी ध्यान अपनी तरफ खींचने में सफल रहे.

भारत लौटने के बाद की गतिविधियां 

डॉ. जाकिर हुसैन उच्च शिक्षा के लिए जर्मनी गए थे परन्तु जल्द ही वे भारत लौट आये.  वापस आकर उन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिया को अपना शैक्षणिक और प्रशासनिक नेतृत्व प्रदान किया. विश्वविद्यालय वर्ष 1927 में बंद होने के कगार पर पहुँच  था, लेकिन डॉ. जाकिर हुसैन के प्रयासों की वजह यह शैक्षिक संस्थान अपनी लोकप्रियता बरकरार रखने में कामयाब रहा था. उन्होंने लगातार अपना समर्थन देना जारी रखा, इस प्रकार उन्होंने इक्कीस वर्षों तक संस्था को अपना शैक्षिक और प्रबंधकीय नेतृत्व प्रदान किया. उनके प्रयासों की वजह से इस विश्वविद्यालय ने ब्रिटिश शासन से भारत की आजादी के लिए संघर्ष में योगदान दिया. एक शिक्षक के रूप में डॉ. जाकिर हुसैन ने महात्मा गांधी और हाकिम अजमल खान के आदर्शों को प्रचारित किया। उन्होंने वर्ष 1930 के दशक के मध्य तक देश के कई शैक्षिक सुधार आंदोलन में एक सक्रिय सदस्य के रूप में कार्य किया.

डॉ. जाकिर हुसैन स्वतंत्र भारत में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति (पहले इसे एंग्लो-मुहम्मडन ओरिएंटल कॉलेज के नाम से जाना जाता था) चुने गए. वाइस चांसलर के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान डॉ. जाकिर हुसैन ने पाकिस्तान के रूप में एक अलग देश बनाने की मांग के समर्थन में इस संस्था के अन्दर कार्यरत कई शिक्षकों को ऐसा करने से रोकने में सक्षम हुए. डॉ. जाकिर हुसैन को वर्ष 1954 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया. डॉ. जाकिर हुसैन को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में अपने कार्यकाल के अंत में राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया था. इस प्रकार वे वर्ष 1956 में भारतीय संसद के सदस्य बन गये. वे केवल एक वर्ष के लिए बिहार के राज्यपाल बनाए,  पर बाद में वे पांच वर्ष (1957 से 1962) तक इस पद पर बने रहे.

जाकिर हुसैन को उनके कार्यों को देखते हुआ वर्ष 1963 में भारत रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया. दिल्ली, कोलकाता, अलीगढ़, इलाहाबाद और काहिरा विश्वविद्यालयों ने उन्हें उन्होंने डि-लिट् (मानद) उपाधि से सम्मानित किया था. राज्यपाल के रूप में अपने कार्यकाल के अंत के साथ ही डॉ. जाकिर हुसैन पांच वर्ष की अवधि के लिए देश के दूसरे उप-राष्ट्रपति चुने गए. उन्होंने 13 मई, 1967 को राष्ट्रपति पद ग्रहण किया. इस प्रकार वे भारत के पहले मुस्लिम राष्ट्रपति बने. वे डॉ. राजेंद्र प्रसाद और  सर्वपल्ली राधाकृष्णन के बाद राष्ट्रपति पद पर पहुचने वाले तीसरे राजनीतिज्ञ थे.

निधन

भारत के राष्ट्रपति के रूप में शपथ लेने के दो साल के बाद ही 3 मई, 1969 को डॉ. जाकिर हुसैन का  निधन हो गया. वे पहले राष्ट्रपति थे जिनका निधन कार्यकाल के दौरान ही हुआ. उन्हें नई दिल्ली में जामिया मिलिया इस्लामिया (केन्द्रीय विश्वविद्यालय ) के परिसर में दफनाया गया है.

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी

 

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी

जन्म: 10 नवम्बर, 1848, कलकत्ता

मृत्यु: 6 अगस्त, 1925, बैरकपुर

कार्य क्षेत्र: स्वाधीनता सेनानी

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी एक प्रसिद्ध भारतीय स्वाधीनता सेनानी थे। वे ब्रिटिश राज के दौरान सबसे शुरूआती नेताओं में एक थे। उन्होंने ‘इंडियन नेशनल एसोसिएशन’ की स्थापना की जो भारत के प्रारंभिक राजनैतिक संगठनों में एक था। आगे जाकर वे भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बने। वे ‘राष्ट्रगुरु’ के उपनाम से भी जाने गए। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी कांग्रेस के उन नरमपंथी नेताओं में शामिल थे जिन्होंने ब्रिटिश शासन का सदैव विरोध किया और देशवासियों के हितों को आगे बढ़ाया। कांग्रेस के स्थापना के बाद के शुरूआती दशकों में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी और गोपालकृष्ण गोखले जैसे नरमपंथी नेताओं का बोलबाला था। इन नेताओं के अनुसार अंग्रेजों के साथ सहयोग करके देशवासियों के हक़ में बदलाव लाया जा सकता था। धीरे-धीरे इनके विचारों का विरोध कांग्रेस के अन्दर ही होने लगा। हालांकि इनके विचारों और आजादी पाने के तरीकों से बहुत लोग असहमत थे लेकिन इस बात से बिलकुल भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इन नेताओं ने आजादी के आंदोलन को तेज करने के लिए एक सशक्त जमीन तैयार की।

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने हमेशा देशवासियों के हितों के लिए अंग्रेजी हुकुमत पर दबाव डालकर कानून में बदलाव लाने की कोशिश की। बनर्जी सहित नरमपंथी नेताओं का गरमपंथी दल के नेताओं के साथ इस बात को लेकर मतभेद था कि गरमपंथी राजनैतिक व्यवस्था में परिवर्तन लाकर भारतियों को शासन का अधिकार दिलाना चाहते थे और इसके लिए वे हिंसात्मक तरीके भी अपना सकते थे।

प्रारंभिक जीवन

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी का जन्म 10 अगस्त 1848 को कलकत्ता में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे अपने पिता दुर्गा चरण बनर्जी के उदार व प्रगतिशील विचारों से बहुत प्रभावित थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा परिवार के पैत्रिक शिक्षा संस्थान ‘हिन्दू कॉलेज’ में हुई। कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद सन 1868 में वे भारतीय सिविल सेवा परीक्षा में बैठने के लिए इंग्लैंड चले गए। सन 1869 में उन्होंने परीक्षा उत्तीर्ण कर ली पर उम्र से सम्बंधित विवाद को लेकर उनका चयन रद्द कर दिया गया पर न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद वे एक बार फिर परीक्षा में बैठे और सन 1871 में दोबारा चयनित हुए। चयन के बाद उन्हें सिलहट में सहायक मजिस्ट्रेट बनाया गया पर ब्रिटिश प्रशासन ने उन पर नस्ली भेदभाव का आरोप लगाकर उन्हें सरकारी नौकरी से हटा दिया। सरकार के इस फैसले के खिलाफ वे इंग्लैंड गए पर उसका कोई नतीजा नहीं निकला। अपने इंग्लैंड प्रवास के दौरान उन्होंने एडमंड बुर्के और दूसरे उदारवादी दार्शनिकों की रचनाएं पढ़ी। इससे उन्हें ब्रिटिश सरकार का विरोध करने में सहायता मिली।

राजनैतिक जीवन

सन 1875 में भारत वापस आने के बाद वे मेट्रोपोलिटन इंस्टीट्युशन, फ्री चर्च इंस्टीट्युशन और रिपन कॉलेज में अंग्रेजी के प्रोफेसर बन गए। इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय, उदारवादी, राजनितिक और भारतीय इतिहास जैसे विषयों पर सार्वजानिक व्याख्यान देने लगे। 26 जुलाई 1876 को उन्होंने आनंद मोहन बोस के साथ मिलकर ‘इंडियन नेशनल एसोसिएशन’ की स्थापना की। यह भारत के सबसे शुरूआती राजनैतिक संगठनों में एक था। उन्होंने इस संगठन के माध्यम से ‘भारतीय सिविल सेवा’ में भारतीय उम्मीदवारों के आयु सीमा के मुद्दे को उठाया। उन्होंने देश भर में अपने भाषणों के माध्यम से ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा नस्ल-भेद की नीति की घोर निंदा की और धीरे-धीरे पूरे देश में प्रसिद्द हो गए।

सन 1879 में उन्होंने ‘द बंगाली’ समाचार पत्र की स्थापना की। सन 1883 में जब अपने पत्र में छपे एक लेख (जिसे अदालत की अवमानना माना गया) के कारण उन्हें गिरफ्तार किया गया तब बंगाल समेत देश के दूसरे शहरों जैसे आगरा, अमृतसर, फैजाबाद, लाहौर और पुणे में इसका घोर विरोध हुआ। धीरे-धीरे ‘इंडियन नेशनल एसोसिएशन’ के सदस्यों की संख्या भी बढ़ गयी और सन 1885 में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने इसका विलय ‘भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस’ के साथ कर दिया क्योंकि दोनों संगठनों का लक्ष्य एक ही था। बाद में उन्हें दो बार कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया (पुणे – 1895 और अहमदाबाद – 1902)।

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी बंगाल विभाजन (1905) का पुरजोर विरोध करने वाले अग्रणी नेताओं में से एक थे। उन्होंने आगे बढ़कर आन्दोलन में भाग लिया और विरोध प्रदर्शन और याचिकाओं का आयोजन किया, जिसके फलस्वरूप अंग्रेजी हुकुमत ने बंगाल विभाजन के फैसले को सन 1912 में वापस ले लिया। वे गोपाल कृष्ण गोखले और सरोजिनी नायडू जैसे उभरते नेताओं के संरक्षक भी बने।

वे कांग्रेस के अन्दर वरिष्ठ नरमपंथी नेताओं में से एक थे और उनका मत था की अंग्रेजी हुकुमत के साथ सामंजस्य बैठाकर बात-चीत का रास्ता अपनाना चाहिए। उनका विचार गरमपंथी दल से बिलकुल विपरीत था जो क्रांति के साथ-साथ पूर्ण आजादी चाहते थे।

वे स्वदेशी आन्दोलन के बहुत बड़े प्रचारक और प्रवर्तक थे। उन्होंने लोगों से विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी अपनाने का आग्रह किया।

स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान नरमपंथी नेताओं के घटते प्रभाव ने सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के प्रभाव को भी कम कर दिया। उन्होंने 1909 के ‘मोर्ले मिन्टो सुधारों’ की सराहना की जबकि देश के बड़े हिस्से और राष्ट्रवादी राजनेताओं द्वारा इसका घोर विरोध हुआ। उन्होंने महात्मा गाँधी के ‘सविनय अवज्ञा’ जैसे राजनितिक हथिआरों से भी सहमत नहीं थे। बंगाल सरकार में मंत्री पद स्वीकार करने के बाद उनकी घोर आलोचना हुई और सन 1923 के चुनाव में वे ‘स्वराज पार्टी’ के बिधान चन्द्र रॉय से हार गए और उनका राजनैतिक जीवन लगभग समाप्त हो गया।

अंग्रेजी राज के समर्थन के लिए उन्हें नाइट की पदवी से सुशोभित किया गया। बंगाल सरकार में मंत्री रहते हुए उन्होंने कलकत्ता नगर निगम को ज्यादा लोकतांत्रिक बनाया।

भारतीय राष्ट्रवाद के निर्माता

पहले ‘इंडियन नेशनल एसोसिएशन’ और फिर ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ के माध्यम से सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने भारत में राष्ट्रवाद विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने देश के शासन में अधिक हिस्सा दिये जाने के लिए कई दशकों तक संघर्ष किया पर बदलते समय के साथ राष्ट्रिय आन्दोलन  स्वाधीनता की माँग में बदल गया जो सुरेन्द्रनाथ की कल्पना से परे था। उनका अंतिम समय आते-आते स्वधीनता आन्दोलन का स्वरुप बिलकुल ही परिवर्तित हो चुका था परन्तु इसमें दो राय नहीं है कि उनका नाम उन नेताओं में शुमार है जिन्होंने देश में राष्ट्रीय आन्दोलन की नींव रखी।

मृत्यु

सन 1923 के चुनाव में स्वराज पार्टी के बिधान चन्द्र रॉय से हारने के बाद वे सार्वजनिक जीवन से प्राय: अलग रहे और 6 अगस्त, 1925 में उनका निधन हो गया।

शहीद उधम सिंह जीवनी

 


शहीद उधम सिंह जीवनी 

जन्म और प्रारंभिक जीवन

उधम सिंह का जन्म शेर सिंह के नाम से 26 दिसम्बर 1899 को सुनम, पटियाला, में हुआ था। उनके पिता का नाम टहल सिंह था और वे पास के एक गाँव उपल्ल रेलवे क्रासिंग के चौकीदार थे।

सात वर्ष की आयु में उन्होंने अपने माता पिता को खो दिया जिसके कारण उन्होंने अपना बाद का जीवन अपने बड़े भाई मुक्ता सिंह के साथ 24 अक्टूबर 1907 से केंद्रीय खालसा अनाथालय Central Khalsa Orphanage में जीवन व्यतीत किया।

दोनों भाईयों को सिख समुदाय के संस्कार मिले अनाथालय में जिसके कारण उनके नए नाम रखे गए। शेर सिंह का नाम रखा गया उधम सिंह और मुक्त सिंह का नाम रखा गया साधू सिंह। साल 1917 में उधम सिंह के बड़े भाई का देहांत हो गया और वे अकेले पड़ गए।

क्रन्तिकारी जीवन की शुरुवात

उधम सिंह ने अनाथालय 1918 को अपनी मेट्रिक की पढाई के बाद छोड़ दिया। वो 13 अप्रैल 1919 को, उस जलिवाला बाग़ हत्याकांड के दिल दहका देने वाले बैसाखी के दिन में वहीँ मजूद थे।

उसी समय General Reginald Edward Harry Dyer ने बाग़ के एक दरवाज़ा को छोड़ कर सभी दरवाजों को बंद करवा दिया और निहत्थे, साधारण व्यक्तियों पर अंधाधुंध गोलियां बरसा दी। इस घटना में हजारों लोगों की मौत हो गयी। कई लोगों के शव तो कुए के अन्दर से मिले।

जेल

इस घटना के घुस्से और दुःख की आग के कारण उधम सिंह ने बदला लेने का सोचा। जल्दी ही उन्होंने भारत छोड़ा और वे अमरीका गए। उन्होंने 1920 के शुरुवात में Babbar Akali Movement के बारे में जाना और वे वापस भारत लौट आये।

वो छुपा कर एक पिस्तौल ले कर आये थे जिसके कारण पकडे जाने पर अमृतसर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था। इसके कारण उन्हें 4 साल की जेल हुई बिना लाइसेंस पिस्तौल रखने के कारण।

जेल से छुटने के बाद इसके बाद वे अपने स्थाई निवास सुनाम में रहने के लिए आये पर वहां के व्रिटिश पुलिस वालों ने उन्हें परेशां किया जिसके कारण वे अमृतसर चले गए। अमृतसर में उधम सिंह ने एक दुकान खोला जिसमें एक पेंटर का बोर्ड लगाया और राम मुहम्मद सिंह आजाद के नाम से रहने लगे Ram Mohammad Singh Azad. उधम सिंह ने यह नाम कुछ इस तरीके से चुना था की इसमें सभी धर्मों के नाम मौजूद थे।

शहीद भगत सिंह के विचारों से प्रेरित

उधम सिंह भगत सिंह के कार्यों और उनके क्रन्तिकारी समूह से बहुत ही प्रभावित हुए थे। 1935 जब वे कश्मीर गए थे, उन्हें भगत सिंह के तस्वीर के साथ पकड़ा गया था। 

उन्हें बिना किसी अपराध के भगत सिंह का सहयोगी मान लिया गया और भगत सिंह को उनका गुरु। उधम सिंह को देश भक्ति गीत गाना बहुत ही अच्छा लगता था और वे राम प्रसाद बिस्मिल के गीतों के बहुत शौक़ीन थे जो क्रांतिकारियों के एक महान कवी थे।

कश्मीर में कुछ महीने रहने के बाद, उधम सिंह ने भारत छोड़ा। 30 के दशक में वे इंग्लैंड गए। उधम सिंह जलियावाला बाग हत्या कांड का बदला लेने का मौका ढूंढ रहे थे। यह मौका बहुत दिन बाद 13 मार्च 1940 को आया।

लन्दन में उधम सिंह ने लिया जलिवाला हत्याकांड का बदला

उस दिन काक्सटन हॉल, लन्दन Caxton Hall, London में ईस्ट इंडिया एसोसिएशन East India Association और रॉयल सेंट्रल एशियाई सोसाइटी Royal Central Asian Society का मीटिंग था। लगभग शाम 4.30 बजे उधम सिंह ने पिस्तौल से 5-6 गोलियां सर माइकल ओ द्व्येर  Sir Michael O’Dwyer पर फायर किया और वहीँ उसकी मौत हो गयी।

इस गोलीबारी के समय भारत के राज्य सचिव को भी Secretary of State for India चोट लग गयी जो इस सभा के प्रेसिडेंट President थे। सबसे बड़ी बात तो यह थी की उधम सिंह को यह करने का कोई भी डर नहीं था। वे वहां से भागे भी नहीं बस उनके मुख से यह बात निकली की – मैंने अपने देश का कर्तव्य पूरा कर दिया।

मृत्यु

1 अप्रैल, 1940, को उधम सिंह को जर्नल डायर Sir Michael O’Dwyer को हत्यारा माना गया। 4 जून 1940 को पूछताच के लिए सेंट्रल क्रिमिनल कोर्ट, पुराणी बरेली Central Criminal Court, Old Bailey में रखा गया था अलाकी उन्हें जस्टिस एटकिंसन Justice Atkinson के फांसी की सजा सुना दी थी।

15 जुलाई 1940 में एक अपील दायर की गयी थी उन्हें फांसी से बचाने के लिए परन्तु उसको खारीच कर दिया गया। 31 जुलाई 1940 को उधम सिंह को लन्दन के Pentonville जेल में फांसी लगा दिया गया।\

उनकी एक आखरी इच्छा थी की उनके अस्थियों को उनके देश भेज दिया जाये पर यह नहीं किया गया। 1975 में भारत सरकार, पंजाब सरकार के साथ मिलकर उधम सिंह के अस्थियों को लाने में सफल हुई। उनको स्राधांजलि देने के लिए लाखों लोग जमा हुए थे।

गणेशशंकर विद्यार्थी

 


गणेशशंकर विद्यार्थी

जन्म: 26 अक्टूबर, 1890, प्रयाग, उत्तर प्रदेश

निधन: 25 मार्च, 1931, कानपुर, उत्तर प्रदेश

कार्य क्षेत्र: पत्रकार, समाज-सेवी, स्वतंत्रता सेनानी, राजनीतिज्ञ

गणेश शंकर विद्यार्थी एक निडर और निष्पक्ष पत्रकार, समाज-सेवी और स्वतंत्रता सेनानी थे। भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन के इतिहास में उनका नाम अजर-अमर है। गणेशशंकर विद्यार्थी एक ऐसे पत्रकार थे, जिन्होंने अपनी लेखनी की ताकत से भारत में अंग्रेज़ी शासन की नींद उड़ा दी थी। इस महान स्वतंत्रता सेनानी ने कलम और वाणी के साथ-साथ महात्मा गांधी के अहिंसावादी विचारों और क्रांतिकारियों को समान रूप से समर्थन और सहयोग दिया। अपने छोटे जीवन-काल में उन्होंने उत्पीड़न क्रूर व्यवस्था के खिलाफ आवाज़ उठाई। उन्होंने उत्पीड़न और अन्याय के खिलाफ में हमेशा आवाज़ बुलंद किया – चाहे वो  नौकरशाह, जमींदार, पूंजीपति या उच्च जाति का कोई इंसान हो।

प्रारंभिक जीवन

गणेशशंकर ‘विद्यार्थी’ का जन्म 26 अक्टूबर 1890 को इलाहाबाद के अतरसुइया मुहल्ले में एक कायस्थ परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम जयनारायण था जो हथगाँव, (फतेहपुर, उत्तर प्रदेश) के निवासी थे। उनके पिता एक गरीब और धार्मिक प्रवित्ति पर अपने उसूलों के पक्के इंसान थे। वे ग्वालियर रियासत में मुंगावली के एक स्कूल में हेडमास्टर थे। गणेश का बाल्यकाल वहीँ बीता तथा प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा भी हुई। उनकी पढ़ाई की शुरुआत उर्दू से हुई और 1905 ई. में उन्होंने भेलसा से अँगरेजी मिडिल परीक्षा पास की। उन्होंने सन 1907 में प्राइवेट परीक्षार्थी के रूप में एंट्रेंस परीक्षा पास की और आगे की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद के कायस्थ पाठशाला में दाखिला लिया। लगभग इसी समय से उनका झुकाव पत्रकारिता की ओर झुकाव हुआ और प्रसिद्द लेखक पंडित सुन्दर लाल के साथ उनके हिंदी साप्ताहिक ‘कर्मयोगी’ के संपादन में सहायता करने लगे। आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण लगभग एक वर्ष तक अध्ययन के बाद सन 1908 में उन्होंने कानपुर के करेंसी आफिस में 30 रु. महीने की नौकरी की पर एक अंग्रेज अधिकारी से कहा-सुनी हो जाने के कारण नौकरी छोड़ कानपुर के पृथ्वीनाथ हाई स्कूल में सन 1910 तक अध्यापन का कार्य किया। इसी दौरान उन्होंने सरस्वती, कर्मयोगी, स्वराज्य (उर्दू) तथा हितवार्ता जैसे प्रकाशनों में लेख लिखे।

पत्रकारिता, राजनैतिक और सार्वजानिक जीवन

गणेश शंकर विद्यार्थी का मन पत्रकारिता और सामाजिक कार्यों में रमता था इसलिए वे अपने जीवन के आरम्भ में ही स्वाधीनता आन्दोलन से जुड़े। जल्द ही वे ‘कर्मयोगी’ और ‘स्वराज्य’ जैसे क्रन्तिकारी पत्रों से जुड़े और इनमें अपने लेख भी लिखे। उन्होंने ‘विद्यार्थी’ उपनाम अपनाया और इसी नाम से लिखने लगे। कुछ समय बाद उन्होंने हिंदी पत्रकारिता जगत के अगुआ पंडित महाबीर प्रसाद द्वीवेदी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया जिन्होंने विद्यार्थी को सन 1911 में अपनी साहित्यिक पत्रिका ‘सरस्वती’ में उप-संपादक के पद पर कार्य करने का प्रस्ताव दिया पर विद्यार्थी की रूचि सैम-सामियिकी और राजनीति में ज्यादा थी इसलिए उन्होंने हिंदी साप्ताहिकी ‘अभ्युदय’ में नौकरी कर ली।

सन 1913 में विद्यार्थी कानपुर वापस लौट गए और एक क्रांतिकारी पत्रकार और स्वाधीनता कर्मी के तौर पर अपना करियर प्रारंभ किया। उन्होंने क्रन्तिकारी पत्रिका ‘प्रताप’ की स्थापना की और उत्पीड़न और अन्याय के खिलाफ आवाज़ बुलंद किया। प्रताप के माध्यम से उन्होंने पीड़ित किसानों, मिल मजदूरों और दबे-कुचले गरीबों के दुखों को उजागर किया। अपने क्रांतिकारी पत्रिकारिता के कारण उन्हें बहुत कष्ट झेलने पड़े – सरकार ने उनपर कई मुक़दमे किये, भरी जुरमाना लगाया और कई बार गिरफ्तार कर जेल भी भेजा।

सन 1916 में महात्मा गाँधी से उनकी पहली मुलाकात हुई जिसके बाद उन्होंने अपने आप को पूर्णतया स्वाधीनता आन्दोलन में समर्पित कर दिया। उन्होंने सन 1917-18 में ‘होम रूल’ आन्दोलन में अग्रणी भूमिका निभाई और कानपुर में कपड़ामिल मजदूरों की पहली हड़ताल का नेतृत्व किया। सन 1920 में उन्होंने प्रताप का दैनिक संस्करण आरम्भ किया और उसी साल उन्हें राय बरेली के किसानों के हितों की लड़ाई करने के लिए 2 साल की कठोर कारावास की सजा हुई। सन 1922 में विद्यार्थी जेल से रिहा हुए पर सरकार ने उन्हें भड़काऊ भाषण देने के आरोप में फिर गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया। सन 1924 में उन्हें रिहा कर दिया गया पर उनके स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया था फिर भी वे जी-जान से कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन (1925) की तैयारी में जुट गए।

सन 1925 में कांग्रेस के राज्य विधान सभा चुनावों में भाग लेने के फैसले के बाद गणेश शंकर विद्यार्थी कानपुर से यू.पी. विधानसभा के लिए चुने गए और सन 1929 में त्यागपत्र दे दिया जब कांग्रेस ने विधान सभाओं को छोड़ने का फैसला लिया। सन 1929 में ही उन्हें यू.पी. कांग्रेस समिति का अध्यक्ष चुना गया और यू.पी. में सत्याग्रह आन्दोलन के नेतृत्व की जिम्मेदारी भी सौंपी गयी। सन 1930 में उन्हें गिरफ्तार कर एक बार फिर जेल भेज दिया गया जिसके बाद उनकी रिहाई गाँधी-इरविन पैक्ट के बाद 9 मार्च 1931 को हुई।

मार्च 1931 में कानपुर में भयंकर हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए जिसमें हजारों लोग मारे गए। गणेश शंकर विद्यार्थी ने आतंकियों के बीच जाकर हजारों लोगों को बचाया पर खुद एक ऐसी ही हिंसक भीड़ में फंस गए जिसने उनकी बेरहमी से हत्या कर दी। एक ऐसा मसीहा जिसने हजारों लोगों की जाने बचायी थी खुद धार्मिक उन्माद की भेंट चढ़ गया।

टाइम लाइन (जीवन घटनाक्रम)

1890: 28 अक्टूबर को गणेश शंकर विद्यार्थी का जन्म हुआ

1907: इलाहाबाद के कायस्थ पाठशाला में दाखिला लिया

1911: पंडित महाबीर प्रसाद द्वारा संचालित ‘सरस्वती’ पत्रिका का उप-संपादक बनाये गए

1913: कानपुर वापस आ गए और ‘प्रताप’ साप्ताहिक पत्रिका की स्थापना की और इसके संपादक बन गए

1916: महात्मा गाँधी से पहली बार मिले; स्वतंत्रता आन्दोलन में कूदे

1917-1918: होम रूल मूवमेंट में सक्रियता से भाग लिया

1920: प्रताप में छपे लेखों के कारण अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया

1922: जेल से रिहा हुए पर सरकार ने उन्हें भड़काऊ भाषण देने के आरोप में प्फिर गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया

1925: अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के स्वागत समिति का अध्यक्ष चुने गए

1926-1929: यूनाइटेड प्रोविंस के विधान सभा सदस्य चुने गए

1931: कानपुर के सांप्रदायिक दंगे में 25 मार्च 1931 को इनकी हत्या हो गई

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